Wednesday, December 10, 2008

तुम कहते हो `आंखें खोलो´

एक तुम हो
जो पानी पर भी उकेर देते हो मन की भावनाएँ
एक मैं हूं
जो कागज पर भी कुछ उतार नहीं पाती
तुमने अकसर झील के पानी पर
पहाड़ और पेड़ ऐसे उकेर दिये
जैसे झील पर उग आया हो एक संसार
झील पहाड़ और पेड़
मैं खोती रहती हूं इनमें
और देखती हूं अपने अक्षरों को
झील में तैरते हुए
पहाड़ पर चढ़ते हुए
पेड़ पर लटके हुए
तब तुम कहते हो
`आंखें खोलो´
पर नजरें कैसे मिलायूं
उस पल

25 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

manvinder ji ,

is poem mein aapne bhavnao ka jo sketch banaya hai , wo adbut hai ..

aur pyar ki ek khushubu si chipi hai ..

bahut sundar

vijay
Note : aaj maine imroz par kuch likha hai , dekhiyenga jarur.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुंदर अभिव्यक्ति है यह

मोहन वशिष्‍ठ said...

मनविंदर जी बहुत अच्‍छी और भावपूर्ण कविता बधाई स्‍वीकारें

कुश said...

बहुत ही सुंदर... वाकई

seema gupta said...

आंखें खोलो´
पर नजरें कैसे मिलायूं
उस पल
"wow, simply fantastic"

regards

कंचन सिंह चौहान said...

एक तुम हो
जो पानी पर भी उकेर देते हो मन की भावनाएँ एक मैं हूं
जो कागज पर भी कुछ उतार नहीं पाती

bahut khub....!

नीरज गोस्वामी said...

बहुत ही संवेदन शील रचना...वाह...
नीरज

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बहुत सुंदर , गजब की तुलना की है आपनी

mehek said...

bahut sundar bhav

Harkirat Haqeer said...

मैं खोती रहती हूं इनमें
और देखती हूं अपने अक्षरों को
झील में तैरते हुए

bhot khub Manvinder ji bhot bhavpuran kavita. acchi lagi ...bdhai...

Shashwat Shekhar said...

Bahut sundar, khaaskar
"जो पानी पर भी उकेर देते हो मन की भावना " prabhaav chod jaati hain.

manu said...

kamaal ka sansaar racha hai

Udan Tashtari said...

क्या बात है...वाकई झील से गहरे भाव!!! बधाई.

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत सुंदर भावः सुंदर शब्द रचना हमेशा के तरह लाज़बाब

अल्पना वर्मा said...

एक तुम हो
जो पानी पर भी उकेर देते हो मन की भावनाएँ एक मैं हूं
जो कागज पर भी कुछ उतार नहीं पाती

bahut sundar!

राज भाटिय़ा said...

आंखें खोलो´
पर नजरें कैसे मिलायूं
उस पल
बहुत सुंदर भाव, बहुत खुब .
धन्यवाद

sukhdeo sahitya said...

आंखें खोलने की बात सभी करते हैं पर दिखता है बाहर का ही सबकुछ जैसे झील में तैरता हुआ एक संसार पर मन की आंखें खोलें भीतर झांकें तो क्या कुछ मिलता है ?

मनुज मेहता said...

माफ़ी चाहूँगा, काफी समय से कुछ न तो लिख सका न ही ब्लॉग पर आ ही सका.

आज कुछ कलम घसीटी है.

आपको पढ़ना तो हमेशा ही एक नए अध्याय से जुड़ना लगता है. आपकी लेखनी की तहे दिल से प्रणाम.

Kumar sambhav said...

.............और देखती हूं अपने अक्षरों को
झील में तैरते हुए
पहाड़ पर चढ़ते हुए
पेड़ पर लटके हुए......... एक बेहद नाजुक रचना , बिम्बों का सुन्दर चित्रण , अच्छा लगा .

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

एक तुम हो जो पानी पर भी उकेर देते हो मन की भावनाएँ एक मैं हूं जो कागज पर भी कुछ उतार नहीं पाती तुमने अकसर झील के पानी पर पहाड़ और पेड़ ऐसे उकेर दिये ....

bahut hi bhavapoorn samvedanasheel abhivyakti.dhanyawad.

अनुपम अग्रवाल said...

लोग पानी और कागज़ पर उकेरते होंगे
आप तो मन पर उकेर देती हैं .
अद्भुत अभिव्यक्ति

शिवराज गूजर. said...

adbhud. bahut hi achha bhavnaon ka prastutikaran. kavita main tivrta hai jo iski jaan hai. badhai.
mere blog (meridayari.blogspot.com)par bhi aati rahen.

प्रकाश बादल said...

वाह मनविंदर जी वाह
एक तुम हो जो पानी पर भी उकेर देतो हो मन की भावनाएं और एक मैं हूं जो क़ाग़ज़ पर भी कुछ उतार नहीं पाती। क्या बिंब है। आपकी इस कविता में हर लाईन अपने आपमें कविता है। तुमने अक्सर झील के पानी पर पहाड़ और पेड़ उकेर दिये वाह वाह जैसे उग आया हो एक संसार झील पर वाह वाह और क्या कहूं

"अर्श" said...

बहोत ही बढ़िया लिखा है आपने
ढेरो बधाई आपको ...

अर्श

vipinkizindagi said...

बहुत सुंदर भाव