Saturday, September 13, 2008

रूह का जख्म , एक आम रोग है............

मन हैरान है दुनिया की रीत देख कर । यहां दिल की कदर नहीं है। यहाँ अहसासों को सिला नहीं है। मेरे मन ने कुछ नया फील नहीं किया है। यह चलता आ रहा है। कभी जाने में तो कभी अनजाने में। इस समय लोग दिल्ली के धमाकों से हिले हुए हैं लेकिन कुछ धमाके चुपचाप भी होते रहते हैं जिनका किसी को पता नहीं चलता है। लोग हर दिन ऐसे धमाकों से रू ब रू होते हैं। मन घायल होता है। दूसरे ही दिन फिर मन के घाव पर मरहम लगा कर काम पर लग जाते हैं . कहीं पढ़ा था, दर्द से जब मन लाचार हो जाता है तो वह दूसरों के रहमों करम का आदी हो जाता है। हमारा अपना कुछ भी नहीं रह जाता है। यह दर्द हमें इतना शुद्ध कर देता है कि हम दूसरों के दर्द के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। हमें उनका दर्द अपना लगने लगता है.दिल्ली के साथ साथ हुऐ दूसरे धमाकों पर अमृता प्रीतम की एक नज्म याद आ गई है......
रूह का जख्म
एक आम रोग है
जख्म के नंगेपन से
अगर शर्म आ जाएं
तो सपने का एक टुकड़ा
फाड़ कर जख्म पर लगा लें
खैर ये तो चलता रहता है जिंदगी मैं....जिंदगी नाम है चलते रहने का....

14 comments:

Pragati Mehta said...

bilkul sahi kaha apne.......kaun sunta hai un dhamakon ko.

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha likha hai.

Udan Tashtari said...

जिंदगी नाम है चलते रहने का....

-सही कहा!!

Deepak said...

zindagi pyaar ka geet hai......per kuch logon ko ye hazam nahi hota.

रंजन राजन said...

मन हैरान है दुनिया की रीत देख कर ।

वर्षा said...

आपका ब्लॉग पहली बार देखा, अच्छा लगा।
ज़िंदगी तो चलते रहने का ही नाम है, बस ये धमाके हमारी भी आदत में शुमार न हो जाएं कि ये तो आएदिन की बात हो जाए। हम सबको आतंकवाद से लड़ना चाहिए।

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

रूह का जख्म
एक आम रोग है
जख्म के नंगेपन से
अगर शर्म आ जाएं
तो सपने का एक टुकड़ा
फाड़ कर जख्म पर लगा लें

लाजवाब करती हैं यह पंक्तियाँ।
पढवाने का शुक्रिया।

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतर सामयिक चिंतन..
बड़ी सुखद तसल्ली है ये....
जीवन चलने का नाम...

मुकेश कुमार मिश्र said...

बहुत सुंदर...

हरि said...

राज भाटिया के ब्‍लाग छोटी छोटी बातें पर एक गीत बजता है। अक्‍सर मैं वहां जाकर ये गीत सुनता हूं-जीना इसी का नाम है....
आपका मन ही नहीं पूरी दुनिया आतंकवाद से हैरान है। इस पर सपने का एक टुकडा फाडकर लगाने से भी कुछ नहीं होगा। आपने सच लिखा है क‍ि हम दूसरों के रहमों करम के आदी हो गए हैं। फिल‍हाल तो यही कहा जा सकता है क‍ि आतंकवादी रहम करें क्‍योंक‍ि ये सरकार तो कोई रहम आम आदमी पर कर नहीं रही।

उमेश कुमार said...

Madam You are a journilist. but you are not paying attiantion on your language. hingilsh is not a good language. please write in hindi or english.
Umesh kumar.

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

बहुत सुंदर.अच्छा लगा....

राज भाटिय़ा said...

जिन्दगी इसी का नाम हे पता नही कब क्या हो जाये, हम सोचते तो वर्षो की हे ,लेकिन अगले पल का भी कुछ नही पता,
लेकिन इस तरह से भी ठीक नही इंसान इंसान के खुन का प्यासा, जिस मे निरिह बच्चे, बुजुर्ग, ओरते, ओर निह्ह्थे सब के सब बेकसुर, यह सब क्यो किस के लिये???
बहुत ही अच्छा लगा आप के विचार पढ कर
धन्यवाद

ajit said...

Bahoot khoob,aapki rachna ko parh kar dil ko tasalli mili. laga bomb dhamake se itar dhamako ki dhamak ko sunne wala bhi koi hai.Aapki is rachna ke liye badhai,aur behtar rachna ki subhkamna. Mujhe aasa hi nahi poora bharosa hai ki bichar aur Vayavhar main aap ak jaisi hongin.