Thursday, September 4, 2008

कोई बताएगा कि बच्चे का क्या दोष है ??

टीवी की एक ख़बर ......... मां ने अपनी नौकरानी के खिलाफ स्टिंग आपरेशन किया है, यह जानने के लिये कि उसकी नौकरानी उसकी नौ माह की बेटी को ठीक से केयर करती है या नहीं। मां को स्पाई केम की क्लिपिंग से पता चलता है कि उसकी गैरमौजूदगी में नौकरानी बच्ची को मारती है, रूलाती है और दूध तक नहीं देती है। माँ का कलेजा दहल उठा। इस क्लिपिंग को मैंने भी देखा कि कैसे नौ महीने की बच्ची नौकरानी से मार खा रही है। उसके रूदन ने मुझे कहीं अंदर तक हिलाया लेकिन साथ ही यह भी सोचने को मजबूर किया जिन बच्चों के माता पिता नौकरी करते हैं वे बच्चे नौकरों के हाथ में सेफ और सिक्योर नहीं हैं। ये एक घर का हाल नहीं है, ऐसे कई बच्चे हैं जो नौकरों से पिटते हैं और दिन भर रोते रहते है। वे माता पिता के दुलार से तो वंचित रहते ही हैं , साथ ही सहम भी जाते हैं.स्वाल यह है कि कामकाजी माता पिता अपने बच्चों के बारे में क्या कदम उठाये? फिर से पुरानी व्यवस्था को अपनाएं जिसमें दादा दादी होते हैं, नाना नानी होते हैं, बुआ होती है, चाची होती है। या पुरानी नौकरानी को बदल कर कोई दूसरी नौकरानी रखें या जब तक बच्चा बड़ा नहीं होता है, या फ़िर बच्चे के देखभाल माँ स्वयं करे।आपको क्या लगता है, क्या करना चाहिए, है कोई सुझाव ????

13 comments:

vineeta said...

मेरा भी आठ महीने का बेटा है. नौकरानी रखने की हसियत होने और अपना मकान होने के बावजूद मैं अपनी माँ के इलाके में किराये के मकान में रह रही हु. मैं ऑफिस जाते हुए अपने बेटे को अपनी माँ के पास छोड़ कर जाती हु. अपना बच्चा अपनों के हाथों में ही सुरक्षित है. सही कहा आपने अपनों का प्यार बच्चो के लिए बड़ा जरूरी है. .....

कविता वाचक्नवी said...

संतान को जब स्नेह चाहिए होता है तब माता -पिता उनके लिए पैसा जोड़ने में लगे रहते हैं, और जब बच्चे इस पैसे का अर्थ समझते हैं तब तक माता पिता से बहुत दूर जा चुके होते हैं. बाद में उन माता -पिता के साथ साथ पूरा समाज ऐसे स्नेह के अभाव में पले बच्चों की कुंठित मानसिकता के फल भोगता है. स्वस्थ व्यकतित्व व सम्पूर्ण नागरिक बन ने के लिए बचपन का लबालब स्नेह से पूर्ण होना परम आवश्यक है .

COMMON MAN said...

bhautikavaadi yug me naitikta ka kshay ho raha hai, aise me is tarah kii ghatnao me nishchit hi vriddhi hogi. aadhunik yug ki nuclear family par prashnchinha lagata hai aapka yeh lekh

anitakumar said...

मेरे हिसाब से सयुंक्त परिवार का दोबारा आगमन होना चाहिए। नौकरानी के पास छोड़ने से तो अच्छा है कि अपने स्वजनों के पास छोड़ा जाए। मैं तो यहां तक कहूंगी कि अगर जरुरत न हो तो फ़ुल टाइम नौकरी करने की भी क्या जरुरत है सिर्फ़ इस लिए कि पढ़ाई लिखाई वेस्ट न हो, बच्चा बिगड़ गया तो पढ़ाई लिखाई तो इस्तेमाल हो जाएगी पर अपना ही जीवन वेस्ट हो जाएगा

अशोक पाण्डेय said...

आप ने विचारणीय सवाल रखा है।

बच्‍चों को नौकर के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं, वह मालिक का गुस्‍सा अबोध से निकाल सकता है। पुरानी व्‍यवस्‍था भी जरूरी नहीं कि हमेशा ठीक ही हो, रिश्‍तेदार जरूरी नहीं कि अच्‍छे ही हों।

मेरे विचार में अपनी परिस्थिति के अनुरूप खुद ही कोई समाधान ढूंढना चाहिए, जैसा कि विनीता जी ने किया है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

संयुक्त परिवार से उत्तम कुछ भी नहीं पर वर्तमान अर्थव्यवस्था जिस प्रकार की है उस में एकल परिवार बढ़े हैं, और परिवार का विकास उसी ओर है। लेकिन बच्चे ही तो हैं जिन के लिए सब कुछ है। वे जीवन की अक्षुण्णता के लिए आवश्यक हैं। इस कारण उन पर ध्यान देना सर्वोपरि है। हमारी धारणाओं के अनुसार हम पितृऋण से बच्चों को सुसंकृत तरीके से वयस्कता तक पहुँचा कर ही उऋण हो सकते हैं।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जब सयुंक्त परिवार होते थे तो इस तरह की समस्या नही होती थी पर अब एकल परिवार होने से यह आम बात हो गई है | बच्चो के लिए कोई ठोस व्यवस्था होनो चाहिए | कोई विश्वास वाला व्यक्ति| तभी गाड़ी ठीक चल सकती है | और मज़बूरी हो तो क्या कर सकते हैं |

Udan Tashtari said...

आज के युग में, जब लोग रोजगार के लिये गाँव छोड़ कर शहर और शहर छोड़ कर बड़े शहर का रुख किए हुए हैं, तब संयुक्त परिवार के विकल्प की बात तो दिवा स्वपन ही कहलाई. आज केरियर ओरियेन्टेड पति पत्नी बच्चे पैदा करने में भी भार महसूस कर रहे हैं, उस वक्त उनके पालन पोषण के लिए कितनी महिलाऐं कैरियर का मोह त्यागेंगी, अनुमान लगाना मुश्किल है. बात फिर स्त्री पुरुष की उठ खड़ी होगी कि महिला ही क्यूँ-पुरुष क्यूँ नहीं घर पर रह कर देखभाल करे बच्चों की. ऐसे में सामन्जस्य बनाये रखने के लिए बीच का रास्ता तो निकालना ही पड़ेगा ही-फिर वो चाहे आया रखने का हो या किसी अच्छे डे-केयर में रखने का. ऐसा नहीं कि सभी आया मारेंगी या डेकेयर अच्छे नहीं होते-मगर अगर कैरियर को ज्यादा महत्व देना है तो इनसे समझौता करना होगा. वेब कैम मानिटरिंग तो हर जगह हो रही है-डेकेयर में भी आप आनलाईन बच्चे को देख सकते हैं-इसमें स्ट्रींग आपरेशन कैसा. यह तो आया को बताया भी जा सकता है कि हम तुमको आन लाइन देखेंगे. इसी कमरे में बच्चे को खिलाओ आदि. क्या गलत है इसमें?
बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है आपने, बधाई.

Tarun said...

विषय बहुत सही उठाया है आपने, आजकल हर कोई जॉब करना चाहता है सिर्फ इस बात से है कि कहीं पढ़ाई लिखाई बरबाद ना हो। लेकिन अगर एक की नौकरी से घर चल जाता है तो क्या दूसरा कुछ सालों के लिये घर नही बैठ सकता। अब ये दूसरा कोई भी हो सकता है, जिसकी नौकरी अच्छी वो करे दूसरा ब्रेक ले।

इस सामंजस्य की बात भी बच्चा पैदा होने से पहले कर लेनी चाहिये। अगर कोई संयुक्त परिवार में रह नही सकता तो उसे कुछ तो आपस में समझौते करने ही पड़ेंगे। कम से कम बच्चे के ३-४ साल का होने तक तो नौकरी छोड़ी जा सकती है। उसके बाद तो इंडिया में स्कूल शुरू हो ही जाता है।

तीसरा ये उपाय है कि अगर आपकी अपने पड़ोस में किसी से बनती है तो उसे ये आफर दे सकती हैं कि वो बच्चे की केयर अगर करती है तो उसे इतना रूपया प्रति घंटे के हिसाब से देगी। दूसरी औरत को भी थोड़ा खर्चा पानी मिल जायेगा और वो कम से कम नौकरानी से अच्छी तरह तो पालेगी ही।

संजय बेंगाणी said...

बच्चे अपनो के हाथ में रहे यही अच्छा है.

Renu Sharma said...

hi , manvindar ji , aapke pryas se kutumb ki pari pati fir se chal sakti hai .

Renu Sharma said...

hi , manvindar ji , aapke pryas se kutumb ki pari pati fir se chal sakti hai .

Renu Sharma said...

hi , manvindar ji , aapke pryas se kutumb ki pari pati fir se chal sakti hai .