Sunday, February 20, 2011

छू कर भी छू न सकी .......

वो डायरी ..... जिसमें तेरे प्यार की खुशबू .... से लिपटे ... कुछ अक्षर .... छिपा के रखे थे कभी .... आज फिर मेरे हाथ लगी .... पन्ना पल्टा ..... तेरा इश्क बैठा था हर अक्षर की ओट में ..... डायरी तो हाथ में थी लेकिन ..... अक्षर बहुत ऊँचे स्थान पर खड़े थे ..... छू कर भी छू न सकी ..... अपनी ही डायरी के अक्षरों को ..... बेदम हाथों से डायरी ..... फिर वहीँ रख दी..... जहाँ से मिली थी .....

14 comments:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

manvinder ji..
bahut hee dil ko chhoo lene wali baat keh di aaapne..!!

ehsas said...

बहुत ही भावपुर्ण प्रस्तुति है। आभार।

सतीश सक्सेना said...

कमाल की अभिव्यक्ति ...बहुत समय तक सोंचने को मजबूर करते रहे ये अक्षर !
शुभकामनायें आपको !!

mansi said...

Speechless Creation.
Mam, I m really proud to work with you. I will try to learn a lot from you..

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति...लाजवाब।

*गद्य-सर्जना*:-“तुम्हारे वो गीत याद है मुझे”

Amit Kush said...

बहुत सुंदर, शब्द संयोजन बेहतरीन.... अमित कुश

वाणी गीत said...

अक्षर इतने ऊँचे जा बैठे अपनी ही डायरी के ...
बहुत सुन्दर !

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाकई बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति है, आभार।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... गहरे तक गूंजते रहे आपके ये शब्द ..... कमाल का लिखा है ...

मेरे भाव said...

वक़्त ने इतनी दूरियां बढ़ा दी कि............ भावमयी प्रस्तुति .

vijaymaudgill said...

manvinder ji apki rachna ik chubhan c de gayi. kahin gahre tak utar gayi. sach main.......
subhaan allah

kase kahun?by kavita. said...

bahut sunder vakt ki doori se bahut unche hote shabd....

मीनाक्षी said...

बेहद खूबसूरत अन्दाज़ में भावों की अभिव्यक्ति मन को मोह गई...