Thursday, February 18, 2010

उसकी प्यास न पानी बनी न आग

उस रात .....................

वो अकेली नहीं ...........................

उस के साथ रात भी जली थी .......................

मैंने उसे आग अर्पित की ..........................

वो और भी सर्द हुई ................................

समन्दर की बात की .............................

तो वो और भी खुश्क हुई ................................

उस की प्यास न पानी बनी ................................

ना आग .....................................

उसके दोष अँधेरे नहीं .................................

रौशनी थे ..............................

उसकी भटकन केवल रिद्हम थी ............................

जब साज निशब्द हुए ..................................

तो वो मीरा बनी ...................................

राबिया हुई ...................................

आखिर .........................................

मंदिर का प्रसाद हुई .........................................

मस्जिद की दुआ हुई ...................................................

10 comments:

Mithilesh dubey said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति लगी ।

पारूल said...

वाह!

वन्दना said...

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति.

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर रचना!

डॉ .अनुराग said...

आप नज्मे रेगुलर क्यों नहीं लिखती ????

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

one of the best from u...

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत खूबसूरत.

RAJWANT RAJ said...

आग से सर्द और समन्दर से खुश्क का अहसास करना
वाह
यकीनन भीगा मन ही इस अहसास को जी सकता है

संजय भास्कर said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति लगी ।

Dr. Amarjeet Kaunke said...

kisi k saath
raat ka jalna....

bahut hi cute symbol.....