Saturday, February 22, 2014

मैं एक दिन धूप में

मैं एक दिन धूप में
घर की दीवारों पर बैठ
घर की दीवारों की बातें
उसे सुना बैठा 
और उसका हाथ
दीवार से हमेशा के लिए
हटा बैठा 
उसका साथ
दीवारों से हमेशा के लिए
गवां बैठा

वो घर छोड़ने से पहले
उस दिन
हर कोने में घूमा
और गारे में खांस रही
बीमार इंटों के गले मिला
और उस मनहूस दिन के बाद
वह कभी घर न लौटा

अब रेल की पटरी पर जब कोई
खुदकुशी करता
या साधुओं का टोला
सर मुड़ा, शहर में घूमता है
या नकसलवादी
कत्ल करता है
तो मेरे घर की दीवारों को
उस समय ताप चड़ते हैं
और बूढ़े घर की बीमार

इंटों का बदन कांपता है
(एक दोस्त का दर्द मेरी डायरी से )

Friday, February 21, 2014

पता है मुझे

पता है मुझे कि तेरा दिल आबाद है
पर कहीं वीरान सूनी कोई जगह मेरे लिये?......



Thursday, October 25, 2012

मेरी और "अडोल" की एक प्यारी सी मुलाकात , मोहन भंडारी जी से ....







मोहन  भंडारी जी पंजाबी के बड़े लेखक हैं....उनकी पंजाबी की   पुस्तक  "मून दी अक्ख" के लिए उन्हें साहित्य अकेडमी पुरस्कार से भी नवाजा गया है .......चंडीगड़ में उनके निवास पर उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ
इस मुलाकात का मुझे अरसे से इन्तजार था |



उनसे मिली तो लगा की  उन्हें भी मुझसे मिलने का बेताभी से इन्तजार था |
मैं जैसे ही निवास पर अपने पतिदेव के साथ पहुंची ,
वो खिड़की में  हमारा इन्तजार कर रहे थे .....मैन गेट पर झट से आ गए ....
उनकी पत्नी हमें सेक्टर ३४ सी के मोड़ पर ही लेने आई हुईं थी |
नहीं जानती इतनी  भीड़भाड़ वाली सड़क  पर  उन्होंने मुझे कैसे पहचान कर गले लगा लिया 
बड़ा प्यारा पल था जब हमारी मोहन भानादारी जी से मुलाकात हुई |
मुझे फ़ोन से ही पता चला था की वे बीमार हैं|
दो दिन पहले ही वे अस्पताल से लौटे थे .....लेकिन उन्हें इन्तजार में खड़े देख  ख़ुशी भी हुई......यह भी महसूस किया कि वे कितने प्यारे इंसान हैं,
तभी तो फ़ोन पर बात होने के बाद उन्होंने मेरी नज्में मंगवाई और पुस्तक "अडोल "का प्रीफेस लिख कर भेज दिया |
मेरी अडोल को उन्होंने ऐसे माथे पर लगाया जैसे कोई शगुन लेकर अपने माथे पर लगता है ......उनके साथ तीन घटे कैसे बीत गए....पता ही नहीं चला 
उनसे हुई बातों को विस्तार से अगली पोस्ट में लिखूंगी .....

Saturday, October 6, 2012

"अडोल" मेरी नज्मों का गुलदस्ता

 लीजिये ......
मेरी "अडोल" के चेहरे से घूँघट 
उठा दिया मेरी माँ ने ....
"अडोल" मेरी नज्मों का गुलदस्ता
"अडोल "..
उन हादसों और मुलाकातों का जिक्र भर है 
जो मुझे कभी ख़बरों के सफर में मिले और जुदा हो गए 
लेकिन उनका असर रह गया 
मैंने उन्हें नज्म की शकल देने का एक पर्यास भर किया है

"मसलन वो लड़की जो शहर की दीवारों पे लिखती रहती है शहर भर में "

Saturday, January 7, 2012

अपनों की दरिंदगी ......

शाम को न्यूज रूम में प्रेमी प्रेमिका के मर्डर पर काफी चर्चा हो रही थी। प्रेमी देवेंद्र ऑन स्पाट मर गया जब कि प्रेमिका सरिता जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। तभी सोच लिया कि सरिता से मिलने जाना ही है। अगले दिन, सुबह की मीटिंग में मैने सरिता को ले कर स्टोरी भी परपोज कर दी थी। मीटिंग के बाद सीधे मेडीकल कालेज की एमरजेंसी में पहुंची। बाहर एक स्टूडेंट डाक्टर धूप सेक रहा था। मैंने उससे पूछा, सरिता इसी वार्ड में हैं क्या, वो ही जिसका प्रेमी गोलियों से छलनी होने के बाद स्पॉट पर ही मर गया है। मेरा जवाब सुने बिना ही उसने कहा, सीधे जाईए, पहले बेड पर सरिता ही है। मैं पहुंची तो सरिता अपने पास बैठे पुलिसिए से धीरे धीरे बोल रही थी। मैंने भी उसकी बात सुननी शुरू कर दी। जहां से मैंने उसकी बात सुननी शुरू की--- बे तो हम्मे मारन को कई दिनां से फिराक में थे, पहले कंकरखेड़ा में, बाद में भी हमला किया, बाद में गाम्म में भी हमला किया, हमने थानेदार धोरे शिकायत की कि हमें खतरा है, म्हारी मदद की जाए लेकिन किसी ने सुनी नहीं। तक तक सरिता को अहसास हो गया कि कोई उसकी पीठ की ओर भी खड़ा है। उसे उल्ट कर देखने में मुश्किल हुई तो मैं उसकी करवट वाली साइड पर आ गई। मुझे देख दीवान जी ने कुर्सी छोड़ दी और बाहर को चला गया। अब सरिता मुझसे खुल कर बात कर सकती थी। मैंने पूछा, जब तुम्हें खतरा था तो तुमने कोई दूसरा शहर क्यों नही चुना, रहने के लिए, और तुमने अपने पति को क्यों छोड़ दिया। तुम्हारी तो तीन साल की बेटी भी है। वो थोड़ी सी थमी और बोली, मेरी मर्जी से शादी कहां हुई थी। दुनिया में सब की शादियां क्या मर्जी से होती है, क्या वे औरतें पति संग रहती नहीं है क्या ? मेरी बात पर ज्यादा गौर किए गौर किए सरिता बोली, मुझसे मेरा पति दहेज की मांग करता था लेकिन मेरे दहेज की मांग को देवेंद्र पूरा करता रहा। मांगे पूरी होने पर भी पति मुझे मारपीट कर मायके छोड़ गया तो मायके में रहना मुश्किल हो गया। मायके आ कर तुम्हे देवेंद्र कहां मिल गया। सरिता बोली, देवेंद्र तो पहले से ही मेरी जिंदगी में शामिल था लेकिन हमारे कोई ऐसी बात नहीं थी जिसे बुरा कहा जा सके। तो फिर तुम्हारे भाईयों को देवेंद्र से क्यों चिढ़ हुई। मेरे भाई तो उस दिन से देवेंद्र से चिढ़ते थे, जिस दिन से उन्होंने मुझे देवेंद्र के साथ बात करते देखा। अरे मैंडम, आप पहले यह बताओं आप हो कहां से ? मैंने बताया, अखबार से। नू कहो न, प्रेसरिपोर्टर हो। मैंने हां में सिर हिला दिया। अब वो और भी अधिक सहज हो गई। सरिता ने जो बताया, उसे आप यह इस तरह से न ले कि यह कहानी मंटो या इसमत आपा की नकल करने के लिए लिख रही हूं लेकिन जब मैंने सुना तो मैं भी एक बार अस्पताल के स्टूल से उछल गई। सरिता ने बताया, वो उस समय से भाईयों की मार खाती आ रही है, जब से उसने होश संभाला है। बेबात पिटती रही। मां अपने बेटों पर नाज करती और उसे सर्द रातों में बिना रजाई से घेर में सोने भेज देती। जब जरा समझ आयी तो उसकी हालत पर देवेंद्र को दया आने लगी। वह उसके दुख दर्द सुनता। ऐसे ही एक दिन देवेंद्र से बात करते हुए भाईयों ने देख लिया। उसके बाद भाईयों ने देवेंद्र पर रेप का केस लगवा कर जेल करा दी। तब मुझे भी देवेंद्र की चिंता हुई। इसी बीच वकील आया और उसने कहा कि लड़की की डाक्टरी होगी। आधे घंटे बाद मेरी मां कमरे में ले जा कर ने मुझे जोर से धक्का दिया और भाई के सामने गिरा दिया। भाई मेरी टांगों में था और मां ने मेरी सलवार का नाला तोड़ दिया। भाई बोला, अब तेरी डाक्टरी रिपोर्ट में रेप की तकसीद भी हो जाएगी, चल मैं बांधता हूं देवेंद्र का इलाज, उसे जेल से बाहर नहीं आने देना चाहे मुझे कुछ भी करना पड़ जाए। मां ने मेरी दोनों बाहों पर अपने पैर रख दिए और भाई मुझ पर झुकने को हुआ। पता नहीं मुझ में कहा से शक्ति आ गई और मैं दौड़ कर दादी की कोठरी की ओर भागी। घेर में आसपास के सभी लोग इक्ठा हो गए। मेरे मुंह से तो आवाज ही गायब हो गई। किसी को भी बताती सगे भाई और मां का किया धरा तो कोई भी यकीन नहीं करता। इसके बाद मुझे घर में नजर बंद कर दिया और मेरी शादी तय कर दी। केस चला और जिस दिन मेरी गवाही होनी थी, मेरी सुबह बहुत पिटायी हुई कि जो मुंह गलत खोला तो जुबान मुंह में नहीं रहने देंगे। लेकिन मैंने कोर्ट में गवाही दी कि मेरा रेप नहीं हुआ है, चाहों तो मेरा मेडिकल करवा लो। और देवेंद्र जेल से छूट गया। आप ही बताओं, मैडम इसके बाद क्या कोई किसी के किए को भूलता है। कुछ दिन बाद ही मेरी शादी जबरन कर दी गई। मैंने सोचा कि मेरा नरक छूट गया लेकिन अभी मेरे हिस्से का नरक बाकी था। दहेज की मांग शुरू हो गई। दहेज की मांग भी देवेंद्र ही पूरी करता। आप बताओ, पति अगर घर से निकाल दे तो लड़की कहां आती है, मां बाप के पास न , मैंने भी यही किया लेकिन मुझे दो चार दिन में मायके से मारपीट कर निकाल दिया गया। मैं रेलवे स्टेशन पर अपनी किसमत को कोस रही थी कि देवेंद्र ने अपनी बहन को मुझे लेने भेजा। मैं देवेंद्र के घर आ गई। यहां एक साल से थी। जनवरी में ही आयी थी। जब देवेंद्र को पता चला कि वह उसके बच्चे की मां बनने वाली है तो वह बहुत खुश था। देवेंद्र के घर में सभी खुश थे। लेकिन जब मेरे गर्भवती होने की बात भाईयों को पता चली तो वे मारने के लिए आ गए।अभी एक महीने पहले भी हमला किया था, कल सुबह तो वे ठान कर ही आए थे कि आज नहीं छोड़ना है दोनों को। और वही हुआ, देवेंद्र तो मौके पर ही मारा गया लेकिन मैं बच गई , पता नहीं अभी और क्या क्या सहना है। देवेंद्र कहता था, मेरे बच्चे का ख्याल रख लेना। अपने पेट पर हाथ रख कर कहती सरिता ने ठंठी सांस भरी, पता नहीं मैं भी जिंदा बचती हूं या नहीं। और मेरे भाई की दरिंदगी.. .. .. .पता नहीं कितने बहनें चुपचाप सह रही हैं हमारे आसपास के समाज में।

Thursday, January 5, 2012

ये कहानी नहीं है .....

वो कभी ये समझ नहीं पाया कि उसके साथ वो स्टेशन पर क्यों जाती थी। कई बार वो अलग पहुंचता और वो अलग। दोनों कुछ देर तक रेलवे स्टेशन पर साथ रहते। बात करते। गाड़ी आती और वो चला जाता। वो भी वापस लौट आती। यह सिलसिला सालों साल चला। एक दिन , वो अपने साथ अपनी लिखी किताब लाया और उसे दे दी। किताब पढ़ते पढ़ते वो किताब में लिखे शब्दों में अपने आप को ढूंडती रही, सारे पन्ने पढ़ लिए लेकिन वो कहीं नहीं थी। किसी अक्षर में उसका चेहरा नहीं था। उसकी बात नहीं थी। वो कहानी उसकी थी ही नहीं। उसके किरदार कोई ओर थे। वो अब भी मिलते हैं लेकिन अब वो ज्यादा खुश रहती है, उस दर्द के साथ जो उस किताब की कहानी से मिला। कहानी ने उसे उसका वजूद बताया। कहानी ने लिखने वाले को भी बहुत कुछ सिखाया क्योंकि कहानी के किरदार उसके नहीं रहे। नहीं पता, उसने कहानी के किस किरदार को क्यों छोड़ा था, क्यों चुना था। क्यों ? क्यों ? यह सवाल तो हैं लेकिन उसके नहीं , जो कहानी में शामिल नहीं हो सकी। उसके हैं जिसने कहानी लिखी। कहानी में किरदार न बन सकना किसमत थी, कहानी के किरदार दगा दे जाए , ये भी किसमत है। अपने अपने हिस्से को जी रहे हैं।

Monday, October 17, 2011

अमृता का केवल अपने पात्रों पर भरोसा

अमृता का चेहरा जितना खूबसूरत है उतना ही मुकिश्ल भी बल्कि ज्यादा मुकिश्ल। उसके भाव बहुत जल्दी जल्दी बदलते हंै। इस चेहरे को किसी फोरम में रिकार्ड करना और वो भी पूरा का पूरा रिकार्ड करना बहुत कठिन काम है। उसके फोटो और स्कैच बहुत ही हार्ड होते हैं। अमृता खुद भी उन्हें देख कर कहती है, ये मै नहीं हूं। मैंने बहुत से चेहरे उकेरे है लेकिन मुझे किसी का चेहरा इतना मुश्किल नहीं लगा है। किसी भी चेहरे को उकेरने में मुझे कभी कुश्ती नहीं करनी पड़ी लेकिन अमृता का चेहरा, तौबा तौबा..पता नहीं किस होनी ने अमृता का चेहरा तराशा है। जितने उसके नैन नक्श तराशे हुए है, उतने ही मुश्किल भी। ब्रश को उकरने भी में भी मुश्किल महसूस होता है। मैं 14 साल से इस चेहरे को पढ़ रहा हूं लेकिन कभी यह चेहरा पास लगता है तो कभी नजदीक लेकिन समझ नहीं आता है। एक दिन इमरोज और अमृता पालम रोड की ओर से आ रहे थे, इमरोज ने कहा, शायरा, तुझे याद है कभी यहां खाली जमीन होती थी जहां तुमने कार चलना सीख रही थी लेकिन साइकिल से टक्कर होने पर तुमने कार चलानासीखना छोड़ दिया था। अमृता ने बहुत हिरख से मुझे देखा और कहा, तम्हें मुझे कार सीखने देना चाहिए था। मैंने कहा, शायरा तुम स्कूटर , साइकिल ट्रकों और छकड़ा गाड़ियों को अपनी कल से अलग रखो। इन्हें मेरे लिए रख दो। अमृता को किसी व्यक्ति पर विश्वास नहीं है। जब मैं किसी पर भरोसा कर कर बात करता हूं तो वह लाल बत्ती की तरह से जलने लगती हैै। मैं कहता हं, व्यक्ति पर एक बार तो भरोसा करने का मौका दिया जाना चाहिए। अमृता को केवल अपने और अपने पात्रों पर ही भरोसा है। जब वह पात्र कहानी से बाहर हो तो उ स पर वह भरोसा नहीं करती है। बरतना माजवाने के बाद वह कटोरी और चम्मच भी गिनती है। कहानी के भीतर जाने पर वही पात्र विश्वास करने योग हो जाते हैं। वह कहती है, बस मैं तेरे पर हजी विश्वास करती हूं, तू ही मेरा इकलौता दोस्त है। इमरोज पूछते हैं, फिर मेरे पर केसे भरोसा है। तमने ही तो कहा था कि तुम मेरे डाक्टर देव के डाक्टर देव हो।

Wednesday, September 21, 2011

मुंबई के वाचमैन का सलाम .....

मम्मी, हमारा वाचमैन केवल वर्किंग लेडीज को ही सलाम बजाता है , आरती ने मुझे सरसरी बातचीत के दौरान बताया; मैंने कहा, क्यों ? आरती बाली, वह नौकरी करने वालियों को कुछ ज्यादा ही बड़ा समझता होगा, शायद इसी लिए । अरे छोड़ उसकी बात। तुझे तो पता है, तू कितना बड़ा काम रही है। अंगद को संभाल रही है। अंगद को अच्छे संस्कार दे रही है। मेरे बेटे को शाम को एक ताजी मुसकान दे रही है। अपने घर संसार को संभाल रही है। चौकीदार को नहीं पता है कि इस समय बेटे को अच्छे संस्कार देने कितने जरूरी हैं। पति को शाम को ताजी मुसकान कितनी ताजगी देती है। आरती कहने लगी, कभी कभी मुझे भी पेशान करते। वो कोई समझ नहीं पाता। मम्मी, आप भी तो नौकरी कर रही हो, मेरे लिए इतना अच्छा जीवन साथी आपने भी तो तैयार किया। अरे , मेरी बात छोड़, मेरे साथ बीजी थीं, पापा जी थे, वे टिंकू और गैरी को एक भी मिनट आंखों से दूर नहीं होने देते थे। स्कूल से लौटने पर उनके लिए पानी का गिलास ले कर खड़े रहते थे। होमवर्क कारन , शाम को घुमाना और रात को कहानी सुनाना। सारे काम वो कर लेते थे। और मैं --- मेरे काम का कोई वक्त नहीं था , मैं तो खबरें लिखती रहती थीं । अब तुम लोग तो न्यूक्लीयर फेमिली में हो। तुम्हें तो सभी मोर्चों पर खुद ही निभाना है।

Sunday, May 8, 2011

मदर्स डे पर ये कहानियां

पिछली रात देर से सोने की वजह से सुबह देर से जगी.....चाय का मग और अखबार ले बैठी थी की आरती का फोन आ गया .......हैप्पी मदर्स डे .....अंगद के बर्थ डे की बात होने लगी ....."अंगद पुणे के दोस्तों को याद करता है .....सोच रही हूँ पुणे जा कर ही बर्थ डे सेलिब्रेट कर लूँ "....आरती ने कहा .....मैंने कहा मुबई में उसके दोस्त नहीं बने क्या...... आरती बोली बच्चे तो सोसायटी में है लेकिन उनकी मम्मियों से दोस्ती जियादा नहीं है .....आरती कहने लगी ......माँ .....यहाँ बच्चे तो हैं लेकिन जियादा बच्चे बाई लोगों के भरोसे ही हैं ......कोई कोई अपनी दादी के साथ होता है लेकिन ऐसे बच्चे भी बहुत कम हैं .....ऐसे मैं कैसे बच्चों को बर्थ डे पर इनवाईट करूँ .....मुझे कुछ अजीब लगा .....मैंने कहा .....उनकी मम्मियों से दोस्ती करो .....तो आरती एक केस बताने लगी.....उनकी सोसायटी में एक वकील लेडी है .....वो शाम को चार बजे घर पहुंचती है ...आते ही अपने बच्चे को आया के साथ बाहर भेज देती है और कह देती है की इसे आठ बजे से पहले न लेकर आना .......बच्चा बेचारा "मम्मा मम्मा" पुकार कर रोता रहता है .....एक दिन सोसायटी की एक बुजुर्ग महिला ने वकील लेडी को ऑफिस जाते समय टोका की उसका बच्चा उसे बहुत मिस करता है ....शाम को कुछ समय उसे दिया करो.....इस पर वकील लेडी ने बुजुर्ग महिला को लेक्चर पिला दिया ......मैं वर्किंग हूँ ....हॉउस वायफ नहीं जो शाम को बच्चे को ले कर घुमती रहूँ ......एक और बच्चे की माँ का हाल सुनाया ......बच्चा स्कूल से लौटने के बाद दिन भर सोसायटी में उदास सा कहता रहता है ....मेरा कोई नही ....मेरा कोई नहीं ......वाचमेन ने बताया की उसकी माँ इवेंट मेनेजर है .....अक्सर देर से लौटती है ..कई बार तो उसे वाचमेन घर तक पहुंचता है क्योंकि वो होश में ही नहीं होती ...... मदर्स डे पर ये कहानियां सुन कर दिल बैचेन हो उठा आज ही के दिन ये सब सुनना था क्या ......मुझे लगा आरती भी कहीं न कहीं ऐसे माहोल से खुश नहीं है .....शायद ये सब एकल परिवारों की देन है ..... उसकी बात से मन हटाने के लिए मैंने अपनी मम्मा को फ़ोन मिलाया ...... कई बार सोचती हूँ ....मेरी मम्मा और आरती सुपर मोम्म हैं .....और मेरी बीजी (मेरी स्वर्गवासी सासू माँ ) भी जिन्होंने मेरे बेटों को पालने में मेरी बहुत मदद की ...... सरिस्का भी सुपर मोम्म बने

Monday, April 18, 2011

बस ...... यूँ हीं याद आ गयी

तुम अपनी भावनाओं को कितनी चालाकी या समझदारी से छिपा लेते हो ...... याद है ....स्टेशन पर जब एक डोगी रेल से कट कर दो टुकड़ों में तड़प रहा था ....मेरा तो हाल खराब हो रहा था .....दिल में घबराहट से बुरा हाल हो रहा था .....गले में बोल अटक रहे थे ......हाथ से चाय का गिलास गिर गया .... यूँ कहूँ की मैं अपनी घबराहट छिपा नहीं पा रही थी ......तुम शांत दिख रहे थे......कहीं तकलीफ तुम्हें भी थी ..... एक बेजुबान की हालत पर ......लेकिन तुमने केवल इतना ही किया .....अपनी चाय को शांत भाव से रेलवे ट्रेक पर गिरा दिया और प्लेटफार्म की बेंच पर बैठ गये...... ____ बस यूँ ही याद आ गयी इस घटना की .........

Friday, April 8, 2011

मंगलपांडेय के लिए ये प्यार नहीं तो और क्या है ?

अकसर जब हवाओं का रूख मोडऩे वाले पैदा होते हैं या यूं कहिए कि क्रांति की आंधियां चलती हैं तो उसमें यह नहीं देखा जाता है कि उसका सिरमौर कौन है ? देखा जाता है तो उस कारवां को जिसमें लोग जुड़ते चले जाते हैं और वो करवां जब अपने मुकाम को हासिल कर लेता है तो इस बात पर गौर किया जाता है कि कारवां कहां कहां से गुजरा ? उसमंे कौन कौन लोग शामिल थे ? 1857 की क्राति भी कुछ एेसी ही थी जो एक कारतूस से शुरू हुई थी। इस क्रांति में पहली शहादत मंगलपांडेय की थी, इसी वजह से मंगलपांडेय को शहर में वही सम्मान मिलता है जो आज इस क्रांति से जुड़े शहर के दूसरे लोगों को मिलता है। मंगलपांडेय वह पहला क्रांतिकारी था जिसने चर्बी लगे कारतूस का विरोध किया था। इसी के बाद कारतूस का विरोध औघडऩाथ मंदिर पर 34 वीं देशी पैदल सेना ने किया था। कारतूस का विरोध ही आगे चल कर बहुत बड़ी क्रांति का कारण बना। भ्रांतिवश लोग यह मानते हैं कि मंगलपांडेय ने मेरठ छावनी में कारतूस का विरोध किया था। इतिहाकारों की मानें तो एेसा कोई सबूत नहीं मिलता है जो इस बात को पुख्ता करेें कि मंगलपांडेय कभी यहां आए थे। वास्तविकता यह है कि सिपाही नंबर 14४6 मंगलपांडेय 34 वीं देशी पैदल सेना के सैनिक थे जो बैरक पुर तैनात थी। यह जगह आज वेस्ट बंगाल में है। मंगल पांडेय ने पहली बार बैरकपुर में ही अंग्रेज अधिकारी पर आक्रमण किया था। इतिहासकार एस के मित्तल के अनुसार 29 मार्च 1857 को मंगलपांडेय को मंदिर में शपथ दिलायी गई थी। यह बात सच के आसपास समझी जाती है क्योंकि 1857 की क्रांति के दौरान अकसर हर समुदाय को धर्मस्थल पर ही शपथ दिलायी जाती थी। शपथ के बाद मगल पांडेय ने ह्यूसन व एक अन्य अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बाघ को जख्मी कर दिया। देश की आजादी के लिए अंग्रेज पर जो सबसे पहला हाथ उठा था, वह मंगलपांडेय का था और वो उस समय अकेला था। यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि अंग्रेजों ने मंगलपांडेय को काफी टार्चर किया तथा उसे अपने साथियों के नाम बताने के लिए दबाव बनाया लेकिन उन्होंेने किसी एक का भी नाम नहीं बताया और स्वयं आत्मघात करने की कोशिश की लेकिन अंग्रेजों ने एेसा होने नहीं दिया। मंगलपांडेय का कोर्ट मार्शल हुआ तथा एक्जीक्यूशन आर्डन नं. 28५ के हतत 8 अप्रैल 1857 को सुबह 5.३0 बजे उन्हें फांसी लगा दी गई। इस प्रकार भारतीय सशस्त्र क्रांति का पहला नायक मंगलपांडेय शहीद हो गया। इसी के बाद मेरठ में 1857 की क्रांति की लहर चली और 10 मई को इसका असली रूप देखने को मिला।

Wednesday, March 16, 2011

हम लड़कियां अपनी सुरक्षा के लिए क्या करें.......

मेरे शहर की बेटियां अब अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं . मंगल वार की सुबह सवेरे शास्त्री नगर की झलक को उसके घर में घुस कर जावेद ने अपनी हेवानियत का शिकार बनाया और उसका गला दबा कर उसे मारने का दुसाहस किया . ....चोट खाए होंठ .... गालों पर नाखूनों के निशाँ और गर्दन पर लाली तो झलक का बहरी दर्द है लेकिन उसके अन्दर का दर्द चीख चीख कर कह रहा है की हम लड़कियां अपनी सुरक्षा के लिए क्या करें....... झलक का दोष बस इतना ही है की वो जावेद के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती थी .....आई आई ऍम टी की ये छात्र इस समाया आनंद हॉस्पिटल में अपने अंदरूनी और बाहरी दर्द के साथ जूझ रही है आप क्या कहते हैं झलक के साथ हुए हादसे पर ......शहर की सुरक्षा पर

Thursday, February 24, 2011

पहली बार हम कहां मिले थे !

चलते चलते ..... कदम थमे..... और सवाल किया उसने..... पहली बार हम कहां मिले थे !..... मैंने कुछ सोचा...... हां ! इसी सदी की ..... तो बात है..... कुछ साल पहले..... शायद ९ /11 को..... नहीं - शायद जिस दिन मुंबई में धामाके हुए थे..... नहीं - शायद जिस दिन ..... पार्लियामेंट पर हमला हुआ था..... नहीं - जिस दिन एक कुंए में अजन्मी बेटियों के ..... भ्रूण मिले थे..... नहीं - जिस दिन ...... बाबरी मस्जिद गिरायी थी..... नहीं - तो फिर ..... बाद में बताती हूं..... kah कर मैंने उससे पीछा छुड़ाया.....

वेलेनटाइन डे जा चुका है.......

वेलेनटाइन डे जा चुका है.......लेकिन 'वेलेनटाइन डे' कहानी आज हाथ लगी। । एक दोहरी कहानी जिसमें संवेदनशीलता साथ साथ चलती है; डा. संजय को जुबैदा से प्यार होता है लेकिन हाथों में थमा दी जाती है सुनयना, इनके हाथों प्यार की ताली कभी न बजी लेकिन बच्चे होते गए, सुनयना ने एक बच्चे का नाम जुबीन रखा तो दूसरे का नाम असद; संजय को बुरा लगा लेकिन वह हमेशा उन्हें मुसलिम नामों से ही पुकारती रही जब कि संजय बेटों को अर्जुन और कार्तिक कह पुकरता रहा। , एक दिन जब संजय ने मुसलिम नामों पर टोका तो सुनयना ने अपने दिल की बात कहीं, 'आप उस दिन मेरे साथ नहीं थे, जुबैदा के साथ थे;' सुनयना की बात को ध्यान देने के बजाए संजय अपनी समानांतर दुनिया में खोया रहा और सुनयना ने अपना भरपूर विकास किया और 'जुबैदा के दोनों बेटों ' को अच्छे तरीके से पाल पोस कर बड़ा कर दिया, वेलेनटाइन डे पर उस समय संजय की आंखें खुली जब उसने महसूस किया कि प्रेम की नदी तो उसके घर में ही बह रही थी। वो व्यर्थ ही स्मृतियों में भटक रहा था। उम्र के आखिरी पड़ाव का यह मिलन सचमुच कहानी का खूबसूरत मोड़ है जो किसी के भी दिल को छू जाएगा . 'वेलेनटाइन डे' कहानी कमल कुमार की लिखी हुई है, मैंने आपसे उसका एक अंश शेयर किया है।

Sunday, February 20, 2011

छू कर भी छू न सकी .......

वो डायरी ..... जिसमें तेरे प्यार की खुशबू .... से लिपटे ... कुछ अक्षर .... छिपा के रखे थे कभी .... आज फिर मेरे हाथ लगी .... पन्ना पल्टा ..... तेरा इश्क बैठा था हर अक्षर की ओट में ..... डायरी तो हाथ में थी लेकिन ..... अक्षर बहुत ऊँचे स्थान पर खड़े थे ..... छू कर भी छू न सकी ..... अपनी ही डायरी के अक्षरों को ..... बेदम हाथों से डायरी ..... फिर वहीँ रख दी..... जहाँ से मिली थी .....

Saturday, December 4, 2010

बच्चे बने रहना कितना अच्छा है न .......

पिछले एक महीने से आरती मेरे साथ थी। घर में बड़ा खुशनुमा माहौल बना रहा क्योंकि अंगद की शैतानियां हर समय मुझे गुदगुदाती रहती। बीच बीच में आरती कहती रहती, गैरी की शादी के बाद पूना जा कर शिफ्टिंग करनी है। उस समय मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन कल उसका फोन आया। 'मां, आज अंगद की टीचर अंगद के स्कूल छोडऩे से बहुत दुखी हो रही थी। टीचर ने अंगद की बुक्स वापस कर दी हैं। उसके स्कूल के दूसरे सामान भी वापस कर दिए है ताकि वह अगले स्कूल में काम आ सकें। मेरी सहेलियां भी मेरे जाने की खबर से दुखी हो रही है। मेरा मन बहुत भारी हो रहा है।Ó यह कहते हुए उसकी आवाज भारी हो रही थी। अंगद तो बच्चा है, उसे किसी के दूर और पास रहने से कोई अंतर नहीं पड़ता, बस आरती और टिंकू से चिपका रहना उसे पसंद है। लेकिन आरती भी अपनी सोसायटी के परिवारों से दूर जाने से कहीं न कहीं बहुत दुखी हो रही है। उसे पिछले तीन सालों में पूना में अपना घर बड़े मन से सजाया। मैं भी एक बार देख कर आ चुकी हूं। उसका अपना सर्किल भी बना हुआ है जिसमंे कभी बर्थडे पाीर्टी तो कभी पार्टी की दूसरी वजह से लेडीज की गेट टू गेदर चलती रहती है। अब टिंकू की पोस्टिंग मुंबई में हो गई है तो उन लोगों को मुंबई शिफ्ट होना पड़ा रहा है। मैं आरती के मनोस्थिति समझ सकती हूं। उसके हाथों से सजाया हुआ उसका घर वहीं रहा जायेगा। वहां की एक एक चीज उसने शौक से तैयार करायी थी। अब वहां कोई किराएदार रहेगा। यह भी मजबूरी है। वे खुद मुंबई में किराए के फ्लेट में रहने जा रहे हैं। अपने प्यारे से घर और दोस्तों से दूर चले जाने का दर्द आरती को परेशान कर रहा है। आरती मेरी बहुत प्यारी बच्ची है। मेरी भूरे बालों वाली बेटी जिसने हमारे घर को परिवार को खुशियां दी है अंगद को हमारी जिंदगी में ला कर। उसके मन का दर्द हालांकि कुछ दिन बाद कम हो जायेगा या फिर यह भी हो सकता है कि अच्छे दोस्त मिल जाने से रहेगा ही नहीं लेकिन फिलहाल मुझे आरती का दर्द अपने सीने में महसूस हो रहा है। आज आरती और टिंकू पैकर्स के साथ बिजी हैं और अंगद भी मां से कह रहा है, मामा, पापा गोट न्यू कार एंड न्यू होम .....बच्चे बने रहना कितना अच्छा है न ।

Tuesday, August 31, 2010

इमरोज की नजर में अमृता

जब तक सूरज आसामन में रहता है, अमृता भी आसमान में उड़ती है। निडर, मनमर्जी की रवानगी से भरपूर और दुनिया बेपरवाह सी दिन के छोटे से छोटे और दुनिया के बड़े से बड़े धमाके सेोपरवाह। दिन का अधिकांश हिस्सा वह अपने साथ रहना चाहती है। रहती भी है, लिखते हुए , पढ़ते हुए। लेकिन रात उतरते ही वह अपने आप में उतर जाती है-ए क आम औरत की तरह से कमजोर, डरपोक, निराश और मोहताज सी। सब के लिऐ फिक्रमंद। छोटे सी आवाज पर सहम जाती है। सुहब उठते हुए उसका चेहरा बुझा बुझा सा और थका हुआ सा लगता है। जैसे वो सारी रात अंधेरे की कोई गुफा पार करके आ रही हो और वो भी अकेली। दिन चढ़ने के साथ ही उसके चेहरे की चमक भी गहरी होने लगती है , जैसे धूप ने अपने रंग उसके हवाले कर दिए हों। सुबह की किरणों में उसकी खुदमुख्त्यारी का यह हाल होता है कि दरवाजे पर पहली घंटी करने वाला भी उसके गुस्से का शिकार हो जाता है। उसके मन के एकांत को कोई खटखटा दे तो यह खटका उसकी जिंदगी में हो जाता है। उसे तो रसोई मे बर्तनों के बजने की आवाज भी नहीं सुहाती।बरतनों केबजने पर वह कहती है, क्या हम फल नहीं खा सकते। न रोटी खाएं,नही bartan झूठे हों, न वोाजें। उस समय उसकी सेवा करने वालों का सलाम भी उसे बुरा लगता है। जमादार का हाथ जोड़ना उसे बुरा लगता है। शायद यह उसकी खुदमुख्तियारी का तकाजा है कि न वो किसी के सामने हाथ जोड़ती है न उसे हाथ जोड़ने वाला अच्छा लगता है। सादकी का आलम यह है कि उसे न नहाने का होश है न ही मेकअप की परवाह। कपड़े बदलने का भी होश नहीं रहता है। नए कपड़े खरीदने की भी वह नहीं सोचती है। जो कमीज उसे पसंद आ जाती है बस उसकी खैर नहीं। हर दिन उसे ही पहना जायेगा। उसके उधड़ने पर उसे बार बार बखिया लगाने की हद कई बार तो किसी पार्टी पर इस लिए नहीं जाती है क्योंकि उसे कपड़ेादलने पडें़गे। एक अजीब तबियत -रोटी चाहे बसी हो या ताजी, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। बासी रोटी पर आम का आचार भी चलेगा। अंदाज होता है कि एक फकीरी उसकी रंगों में बहती है। पर कभी कभी उसकी ताीयत राजा की माफिक हो जाती है। एक दिन हम चाय पी रहे थे, चाया पीते पीते उसकी नजर एक खूबसूरत मकान पर गई, उसने में हुकुम के अंदाज ने कहा, जा कर इस मकान की कीमत पूछ कर आयो। जवाा दिया,बहुत अच्छा। उसने क बार ऐसा ही किया। करती है तथा करती रहेगी। कानों में सोने की बाली आधे घंटे से ज्यादा नहीं पहन सकती। मैंने रइस फकीरनी का भेद पा लिया। हीरा मोती नीलम और पुखराज उसके लिए नहीं बने हैं। कनॉटप्लेस में हीरों की दुकान के सामने से गुजरती है, उसकी बादशाहत तबियत उसे दुकान के अंदर खींच लेती है। हीरे मोती, पुखराज और ऐसे ही कीमती पत्थर वह देखती है तो देखती ही रह जाती है। उस समय उसका चेहरा जगमगाने लगता है हीरों से भी ज्यादा। वैसे उसने खरीदा कुछ भी नहीं है। उसे पता है कि यह जेवर और हीरे मोती उसके लिए नहीं है।अगर कोई जेवर वह पहन भी लेती है तो शीशे के सामने जा कर कहती है, ये तो मैं नहीं हूं, और उस समय वह जेवर उतार कर रख देती है। उसे अपना चेहरा खुद को ही पहचान में नहीं आता है। कभी घड़ी पहनती थी लेकिन आ वक्त देखना ही नहीं है्र सो घड़ी भी नही पहनती। वक्त मेरे से पूछ लेती है। तसुर से माला माल यह शायरा अगर सचमुच अमीर होती तो पता नहीं, कितने सुंदर घर और हीरे मोतियों का मालकिन होती। ये फकीरनी नाजुक मिजाज भी बहुत है तो पोजेसिव भी। इसके मकान में कोई भी कील तक नहीं गाड़ सकता है। अगर किसी ने ऐसा करने की कोशिश की तो ये जख्मी शेरनी की तरह से उस पर टूट पड़ती है।

Wednesday, July 28, 2010

दिल डरता है जवाबों से....

सवाल बहुत हैं ...... पर दिल डरता है जवाबों से..... कहीं जवाब ये न हो....... कहीं जवाब वो न हो...... इसी ये और वो में ....... जिंदगी बसर हुए जाती है.......... पर सवाल हैं कि ....... साथ साथ चलते हैं........ कांटों की चुभन सहते हैं....... जवाबों का डर सहते हैं...... पर अपना वजूद नहीं खोते ....... मेरे साथ साथ चलते हैं.......

Friday, July 23, 2010

बिरहा के सुल्तान शिव तुम्हें लूना याद करती है ........

दोस्तों , समाज में बेमेल विवाह हर दौर में होते रहे हैं , अभी भी जारी है। कभी किसीोटी को मजाूरी में तो किसीोटी को जानाूझ कर तिगुनी उम्र के मर्द के साथ जोड़ दिया जाता है। चंो की पहाड़ियों में रहने वाली लूना ऐसा ही चरित्र है जिसे अपनी कलम से कई कलमकारों ने छूने का प्रयास किया है। दरअसल, लूना को उस व्यक्ति के लड़ बांध दिया जाता है जिसका बेटा लूना के बराबर का है। लूना के पिता की भी मजाूरियां रहीं होंगी लेकिनोमेल विवाह ने लूना को कैसे हर दिन तोड़ा, इसका जिक्र जा काव्य रूप में पंजाा के कवि शिव कुमाराटालवी ने किया तो वह पजाां की लोकगाथा साान लोगों की जुाां वर चढ़ गया। आज शिव कुमाराटालवी का जन्म दिन है। लूना का जिक्र मैं इस लिए कर रही हूं क्योंकि शिव ने एक मर्द हो कर भी लूना के दर्द को समझा और उसे शदों से अपने काव्य में पिरो दिया। लूना का दर्द शिव के शदों इस तरह से उभरा कि लूना काव्य ग्रंथ ने शिव को रातों रात कवियों की पहली कतार में खड़ा कर दिया। शिव को लूना के लिए 1965 में साहित्य एकेडमी पुरस्कार भी मिला। मात्र 28 वर्ष की उम्र में साहित्य एकेडमी अवार्ड लेने वाला शिव पहला कवि है। आ हम बात करते हैं लूना के दर्द की, जो कभी उसके दिल में ओने बाबुल के लिए उठा तो कभी बाबुल की रसोई के चूल्हे में जला। लूना को शिव ने बड़े अनोखे ढंग से पेश किया है। लूना के दर्द को उजागर करने के लिए शिव ने लूना से ही उसकी सखियों को संोधित करवाया। कभी शादी के रिश्ते कीाात शुरू होने पर तो कभी विवाह के मौके पर। कभी लूना के पति के साथ साथ रहते रहते । आज शिव को याद करते हुए मैं कुछ उन पलों का अनुवाद प्रस्तुत करने जा रही हूं जहां लूना का ही नहीं हर उस औरत का दर्द समझा जा सकता है जो लूना जैसी परिस्थितियों से गुजरी है। ----------- सखियो...... मैं आग चली परदेश...... आग चली परदेश...... एक छाती में हाड तपता....... एक छाती में जेठ........ ओ मैं आग चली परदेश....... आग की उम्र में....... हर आग........ ja baithati है pardesh...... हर आग के....... ाााुल के चूल्हे....... सदा न रहता उसका सेक....... हर आग के......... ाााल की जायी....... चली जाए परदेश....... यह क्या आग के लेख....... सखियो....... ये क्या आग के लेख...... हर घर की कंजक....... पर जा आती है आग की रूत....... हराााुल...... वर खोजन निकले...... हर आग सा मेल...... हर आग ही छोड़ जाए....... सखियो...... हराााुल का देश....... लगा हाथों पर जलती मेहंदी...... पहन का आग का भेष...... मैं आग चली परदेश...... पर सखियो....... मैं कैसी आग हूं........ कैसे मेरे लेख....... तो मुख का सूरज जलता...... दूजा जले पांव तले....... तीजीौठी........ देह के आंगन में...... फिर भी सखियो......... ाुझता जाता...... इस अगन का सेक........ जोाााुल वर........ खोज लिया....... वो न आया मेरे मेल....... मैं आग चली परदेश...... सुनो सखियों........ आग के दर्द को कौन सुने...... आग के दर्द को कौन पहचाने....... आग के दुख को जाने कौन...... सखियो...... जा भी आग जन्म लेती है...... आग की अांरी रो पड़ती है........ कोख में सोची थी पुत्र की खुशाू....... पर आग जन्मी....... आग देख अमड़ी का दूध सूखे......... और कलेज में होल उठे ...... ाााुल की पगड़ी होतीोरंग...... ...... कितनीाुरी सोच पड़ती है...... जन्म दिहाड़े से...... द्वार सेािदा करने की....... चिंता पड़ती है...... यहां लूना अपने आप को आग कहती हुई अपनी aapa biti कह रही है। सच, उसके दर्द कोई थाह नहीं है लेकिन इन पंक्तियों को आप क्या कहेंगे जिसमें शिव कुमार ने शायद अपना भी दर्द जोड़ दिया है। ----------- ओ सखियो...... री कुजिओ (चााियो)....... मुझे ऐसा ताला मारो....... न वो खुले...... न वो टूटे....... चाहे लाख हथौड़े मारो...... ---------- शिव की लूना पढ़ कर लूना का दर्द हर औरत के दिल में कुदालें चलाता है। शिव कुमार के जन्मदिन पर सभी कलमकारों का शिव को नमन।