Monday, August 31, 2009
ये बातें अमृता के साथ हैं या उन फूलों के साथ
आज अमृता जी का जन्म दिन है .......अमृता की बात करो तो इमरोज की बात खुद ब खुद शुरू हो जाती है ....इमरोज से बात करो तो वहां सब ओर अमृता ही मिलेंगी .....इमरोज के शब्दों मैं उनकी एक नज्म .....
किसी के साथ बातें की .......पर बात न बनी .......चले .......पर पहुंचे नहीं ......सोये ......पर जगे नहीं ..............वो मिली..... उसने मुझे देखा .....पता नहीं क्या देखा .....मैंने भी उसे देखा..... पता नहीं क्या देखा..... बोले भी नहीं ...............पर बात बन गई .....चले भी नहीं .....पहुंच गए .....सोये भी नहीं ..... जाग गए ......
पता नहीं ये बातें अमृता के साथ हैं या उन फूलों के साथ जो आज इमरोज अमृता के लिए लाये हैं
Monday, July 27, 2009
........लेकिन पानियों पर चलने को राजी नहीं होते कदम ....
जिन वजहों से ........
पानियों में कभी बहे ........
वो वजहें अब पानियों में बह गई हैं ........
अब ........
उन पानियों के दो किनारे बन .......
पानियों में ......
उन वजहों को टटोलते हैं .......
पर हर बार हाथ खाली ही रहते हैं .......
थक कर खड़े होते हैं .......
पानियों में अपनी अपनी परछाई ........
देख पानी पर चलने की कोशिश करते .......
लेकिन पानियों पर चलने को राजी नहीं होते कदम .......
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Tuesday, July 14, 2009
मैं क्या बोलूं .....मेरे पेरों तले की जमीं चोरी हो गई है ...
हमारी दुनिया का इतिहास दो लफ्जों से वाकिफ है, एक वतरपरस्ती लफ्ज से और एक वतनफरोशी लफ्ज से । इनमें एक लफ्ज को इज्जत की नजर से देखा जाता है तो दूसरे लफ्ज को हिकारत की नजर से देखा जाता है। ये जो मीडिया के सामने अपना मुंह छिपाये बैठी है, उससे सब पूछ रहे हैं कि उसका बलात्कार कैसे हुआ, वो कौन था वगैरा वगैरा............इसके होंठ वक्त ने सिल दिये हैं लेकिन इसके दिल की जुबान कह रही है........तुम कब उनकी बात करोगे , जिनके पैरों तले की जमीन को चुरा कर उनके बदन को ही उनका वतन करार दे दिया जाता है । और यह भी कह रही है........मैं .....जो कभी घरों की दीवारों में चीनी गई हूं तो कभी बिस्तर में चिनी जाती हूं......क्योंकि मैं एक औरत हूं.......
( ये फोटो सुनील शर्मा द्वारा किल्क किया गया है..........)
Friday, July 10, 2009
शुक्रिया ... ......आपने मुझे याद रखा
मेरे जन्म दिन के मौके पर यूँ तो आधी रात से ही फ़ोन काळ आने शुरू हो गए थे लेकिन सुबह सुबह कविता जी ने जब फोन पर जन्मदिन की बधाई दी और बताया की पाबला जी की पोस्ट में भी जन्मदिन का जिक्र किया गया तो मैंने सिस्टम आन किया ........इसके लिए मैं पाबला जी का शुक्रिया करती हूँ । कुछ देर में रचना जी ने भी मेरी फोटो के साथ जन्मदिन की पोस्ट डाली ........दोनों ही पोस्ट पर मेरे ब्लॉगर दोस्तों ने बधाइयों का अंबार लगाया हुआ है ......मुझे दिल से खुशी हो रही है .......मैं एक बार फ़िर पाबला जी का और रचना जी का शुक्रिया अदा करती हूँ ..... उन सभी दोस्तों भी शुक्रिया जिन्होंने मुझे विश किया
Sunday, June 28, 2009
......और नज्म अडोल खड़ी रह गई
रात जब जाग गई तो ......
अपनी ही लिखी नज्म ......
सिरहाने आन खड़ी हुई ......
नींद से बेजार आंखों ने ......
नज्म के फिक्रे के पीछे ..........
छिपे साये को देखा..........
साया चुपचाप .......
गारे के इतिहास में उतर गया ........
दबी यादों को कुरेदने लगा........
सिले जख्मों के धागे .......
उसने नज्म के हवाले कर दिये ...........
नज्म के होंठों में कंपन देख ........
साया फिक्रे में .........
जा मिला ........
और .....
नज्म अडोल खड़ी रह गई .........
Wednesday, June 24, 2009
उधड़े हालात सिलती ... ........वो लड़की
वो लड़की ........
जो हर वक्त अपने घर के कच्चे आंगन में बैठी बड़े ध्यान से उधड़े हुए हालात सीती रहती है। इस कदर ध्यान से सीने काम करती है कि लगता है , धागा खुद ब खुद कपड़े पर उगता चला जा रहा है। दिल कहता है......
दुआ भी एक धागा है जिससे बंदे का रब से सिला जुड़ा रहता है। दुआ के कई रंग हैं , धागों की तरह । जो धागे सिर्फ ख्चाहिशों की मांग के रंग से रंगे रहते हैं , उन धागों से काढ़ी गई दुआ के रंग अलग से होते हैं लेकिन जिन रंगों पर रब की मोहब्बत का रंग चढ़ा होता है , उनसे काढ़ी गई दुआ की खुशबू आती है। दुआ की छांव में बैठ कर कुछ मांगना जरूरी नहीं है, इस छाव में छिपे हुए खूबसूरत सफर की आहट सुनना भी खास है। वो लड़की, बहुत कुछ सिखाती है।
वो लड़की , रब सरीखी मोहब्बत की बेल काढ़ रही है। मोहब्बत की गलियों की धूल बुहार रही है
उस लड़की को यकीन हैं.....
कभी तो वो आयेगा......
यहां कदम रखेगा......
Sunday, May 24, 2009
जिन्दगी के कुछ टुकड़े ......जो गिर गए कहीं
मेरा एक टुकड़ा मैले दिनों की सीड़ियों में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा खुश रंग आंखों के प्याले में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा बरसात के मौसम में , जुदायी में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा एक छोटी सी भूल के किनारे गिर गया है।मेरा एक टुकड़ा खामोशी के बीच गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा टूटे हुए वायदे में गिर गया है। मेरा एक हिस्सा सच के सवाल के किनारे गिर पड़ा हैं। मेरा एक टुकड़ा ........ओह ! अब कैसे कहें..... क्या क्या कहें......? कहां कहां ढूढें़ हम अपने टुकड़े...................
किसी की लिखी हुईं इन पक्तियों को पढ़ते पढ़ते पता नहीं क्यों किसी जंगल में कई काल, कई जन्म चलते जाने का अहसास होता है।
अरसा पहले एक नज्म लिखी थी......
जिस घड़ी हमने हंसना था खिलखिला कर
उस घड़ी हमने अपने सांसों की आवाज को
अपनी मुठ्टी में कस कर पकड़ लिया
और देखते रहे ---सूरज का बेअवाज सफर
पड़ों की बेआवाज सरसराहट
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