Monday, March 16, 2009

हम उलटी दिशाओं के बादल

उस दिन
आसमान साफ था
बादलों में हलचल थी
वो अचानक मिले
जब उन्हें होश आया तो काफी आगे निकल चुके थे
वापस आना संभव न था
उस दिन
बदली ने कहा
मैं हवाअों के वश में हूं
मेरी किसमत में हैं पहाड़ों की चट्टानें
मेरे सामने हैं न खत्म होने वाली राहें
बिछड़ते हुए उदास न होना
कहीं
भटक जाऊं पहाड़ों में
या सुनसान राहों में
और मुझे नसीब हो रेत की एक कब्र
उस कब्र पर अगर पहुंचो
तो उस पर इबारत टांक देना
" हम उल्टी दिशायों के बादल
अचानक टकरा गये
फिर सारी उम्र लड़ते रहे हवाअों के खिलाफ "

Friday, March 6, 2009

मेरा ब्लॉग हुआ एक वर्ष का

आज मेरे ब्लाग को एक साल हो चला है। समय का पता नहीं चला। जब मैंने ब्लागिंग ‘ाुरू की तो मुझे ब्लाग की ए बी सी डी भी नहीं पता थी। हां, लिखने का ‘ाौक था ही क्योंकि मेरा प्रोफेशन ही ऐसा है। ब्लाग और ब्लािंगंग में मुझे कई लोगों का सहयोग मिला है। ब्लाग से भी बहुत पहले मुझे लिखने के लिये प्रेरित करने वाले हैं ओमकार चौधरी जो खुद भी एक ब्लागर हैं, साथ ही हरी भूमि के संपादक भी। ब्लाग को बनाने में मेरे बेटे गैरी और बेटे जैसे ही पत्रकार साथी सचिन राठौर ने बहुत मदद की। अकसर ब्लािंगग के टिप्स दिये रंजना भाटिया और रचना सिंह ने। तो आप समझ सकते हैं कि ब्लाग से कैसे मैं ब्लागिंग तक पहुंची। पिछले महीने मेरठ में ब्लागिंग पर सेमिनार हुआ तो मुझसे मंच पर बोलने के लिये कहा गया, मैं कुछ ज्यादा नहीं बोल सकी लेकिन आज कहती हूं कि सच में यह अभिव्यक्ति की आजादी तो देता ही है , साथ ही सृजन की दिशा भी दिखाता है। कुछ लिखना , फिर उस टिप्पणी मिलना, ये सब अच्छा अनुभव देते हैं। बहुत से पुराने पुराने ब्लागर हैं, जैसे समीर जी और अनूप जी उनसे भी समय समय पर बहुत कुछ सीखने को मिलता रहता है।

Tuesday, February 24, 2009

ये कैसे दिन हैं ????

ये कैसे दिन हैं
पैर लकीरों से बाहर चलना चाहते हैं
कंधे संस्कारों के बोझ से मुक्त होना चाहते हैं
माथे पर मोहब्बत का परचम नहीं
बस शिकन है
शिकवे शिकायत की गूंज है
आंखों के खुश्क समंदर में कोई ख्वाब नहीं, किरच है
ये कैसे दिन हैं
पैरों के नीचे गरम गारा है
कदम कदम पर हवा में तलखियां हैं
लेकिन पैरों को जल्दी है नजर की सरहद से पार जाने की
ये कैसे दिन हैं
मन में मोह नहीं, बस रोश है
दिल में तूफान है, लपट है
कहीं चैन नहीं, टिकाव नहीं, नींद नहीं ख्वाब नहीं
खाली उदासी हैं, दिल उचाट है
ओ योगी, बता तो ये कैसे दिन हैं
क्यों हर पल गुजरे पल की तरह गुजरता है
गुजरा पल क्यों सूल सा चुबता है
मन की नाजुक माटी में आने वाला पल
क्यों खंजर की नोक का इंतजार करता है
एक अजीब खलिश से सने ये अलफाज किसी खोये हुए ‘ाायर की डायरी के हैं

Sunday, February 15, 2009

लुक ऐ बिट हायर

दिल्ली रेडियो के लिये जब विश्व के कुछ लोकगीत अनुवाद करके एक धारावाहिक क्रम में प्रस्तुत किये गये तो उन्हें पुस्तक रूप में प्रकाशित करते समय वह पुस्तक `आशमा` हो ची मिन्ह के शब्द दोहराते हुए उन्हें ही अर्पण कर दी। फिर मुझे हो ची मिन्ह का तार मिला जिसमें उनकी ‘शुभ कामनाएं थीं। मन की दशा कुछ बदली। साथ ही एक अंग्रेजी फिल्म याद आ गई जिसमें महारानी एलिजाबेथ को जिस नवयुवक से प्रेम हो जाता है, उसे वह समंदरी जहाज दे कर एक काम सोंपती है, जहाज जब रफ्तार पकड़ता है महारानी दूर से जहाज को दूरबीन लगा कर देखती है। जहाज का नजारा महारानी को परेशान कर देता है। देखती है कि नौजवान की प्रेमिका भी जहाज में उसके साथ है, वे दोनों डैक पर हैं। उस समय महारानी को परेशान देख कर उनका शुभ चिन्तक कहता है, मैंडम ! लुक ए बिट हायर! उपर , उस नवयुवक और उसकी प्रेमिका के सिरों के उपर महारानी के राज्य का झंडा लहरा रहा था।
अमृता की डायरी के प्रष्ट का एक छोटा सा हिस्सा है।
कमजोर पल हर किसी की जिंदगी में आते है लेकिन जिंदगी चलती रहती है। जिंदगी की परेशानिओं से उपर देखने की आदत होने लगती है

Wednesday, February 4, 2009

चाँद ......फिजा .....और वेलेनटाइन

कल शाम में वेलेनटाइन डे पर एक स्टोरी लिखने बैठी तो टीवी की खबरें कानों में पढ़ने लगी, गौर से टीवी की ओर ध्यान किया तो फिजा अपने चांद को कोस रही थी। उसके हाथ में मोबाइल था जिसे वह मीडिया को दिखा रही थी कि वर्ष 2006 में चांद ने उसे मैसेज किया जिसमें उसने कहा , अगर तुमने मेरे साथ शादी नहीं कि तो मै मर जायूंगा। मैसेज दिखाने के बाद फिजा ने मीडिया को कहा ,चांद ने मेरा प्यार देखा अब वो मेरा दूसरा रूप भी देखने के लिये तैयार हो जाये। प्यार में जाने अंजाने ही दोनों प्रेमियों के चर्चे आम हो गये ,छिपाने के लिये कुछ न रहा। तभी मेरा ध्यान अपने सामने रखी हुई नोटिंग की ओर गया, मैंने वेलेनटाइन के लिये नोटिंग में लिखा हुआ था कि प्यार कुछ पाने का नाम नहीं है, प्यार बहुत त्यागने का नाम है। प्यार को जताया नहीं जाता है। अपने प्यार को सभी गलतियों के साथ स्वीकारा जाता है। बजाये अपने प्यार को बदलने के, खुद को उसके अनुसार बदलना प्यार है। मन में सोचा कि अब यह बातें केवल किताबों और किस्सों की बातें हैं। बात चांद और फिजा की हो या वेलेनटाइन मूड की, सभी में अर्थ प्रधान हो गया है। खैर.......मैं भी कहाँ अटक गई हूँ.........फिर बात होगी। मेरी नोटिंग को जाने दें.....चाँद और फिजा के तो राज अभी खुलते रहेंगे ......प्यार का मतलब तो प्यार ही रहेगा

Sunday, January 25, 2009

जन्म दिन मुबारक इमरोज

कई बातें ऐसी होती हैं जो खास नहीं लगती हैं लेकिन बरसों बाद उनके अर्थ तकदीरी अर्थ हो जाते हैं। एक जगह इमरोज ने लिखा है,
मेरा दूसरा जन्म हुआ
जब पहली मुलाकात के बाद
तुमने मेरा जन्म दिन मनाया
और फिर
मेरी जिंदगी का जश्न भी तुमने ही मनाया
खूबसूरत सोचों के साथ
और कविता कविता जिंदगी के साथ
शामिल हो कार वो भी चालीस साल
आज भी
तेरी वो शमूलियत
मेरी जिदगी में
जिंगदी की सांसों की तरह से जारी
और तेरी मेरी जिंदगी के मेल का वह जश्न भी
इससे से भी सालों साल पहले अमृता ने किसी कमजोर पल में जिंदगी से शिकवा किया
लक्ख तेरे अंबरा विच्चों, दस की लभ्भा सानूं
इक्को तंद प्यार दी लभ्भी , ते ओह वी तंद इकहरी
पर सच तो यह है यह इकहरा तार सालों साल गुजर जाने के बाद भी कमजोर नहीं हुआ और अमृता को अपने में लपेटे हुए साथ साथ चलता रहा। जब अमृता जिंदा थी, उस दौर में भी। आज जब अमृता नहीं हैं, तब भी। और हां, कुछ लोगों के साथ कुछ अलग सा घट जाता है। देश के बंटवारे का अमृता के जीवन पर बहुत गहरा असर रहा, यह असर उनके लेखन में भी पढ़ने को मिला। इमरोज का जन्म बटवारे से कई वर्ष पहले हुआ लेकिन वह दिन था 26 जनवरी का दिन। मैंने उनसे वैसे ही एक दिन पूछ लिया, आपका जन्म इतने अच्छे और राष्ट्रीय महत्व के दिन हुआ है, इस पर इमरोज मासूम सी हंसी हंस कर कहते हैं, जब मैं पैदा हुआ था तब 26 जनवरी का कोई महत्व नहीं था, 26 जनवरी का महत्व को तो तब हुआ जब इस दिन देश को गणतंत्र देश का दर्जा दिया गया।मेरा जन्म तो पहले ही हो चुका था। मैंने मन के अंदर ही अंदर कहा, इमरोज, तुम वो नूर हो, जिसकी रोशनी से समाज में बहुत कुछ ऐसा हो गया जिसकी लोग मिसाल देते हैं, देते रहेंगे। तुम अमृता का वो इकहरा तार हो जो न कभी कमजोर था, न कभी कमजोर होगा। तुमने आज भी अमृता को इस तार में लपेटा हुआ है।

Sunday, January 18, 2009

बादलों के महल में सोया है सूरज

चार दिन पहले ही मकर संक्रांति थी। सोचा रसोई में कुछ बना लूं। दो मन हो रहे थे। मन धुंआ धुंआ था लेकिन बात यह भी सता रही थी कि इस दिन का कुछ तो होना चाहिए। सो खीर चढ़ा दी। खीर की खुशबू से सारा घर महक उठा। इसके बाद खिचड़ी के लिये चावल धोए। चावलों पर जरा सा पानी क्या पढ़ा, कच्चे चावल भी महकने लगे। चूल्हे पर एक तरफ खीर बन रही थी तो दूसरी ओर खिचड़ी।दोनों में कड़छी चल रही थी। पतीले में कड़छी चलाते हुए लगा कि उंगलिये के जरिये धीरे धीरे कड़छी में मैं उतर रही हूँ । अब पतीले में खीर नहीं, यादों के बवंडर हिल रहे है। मन अंधेरे गारो में उतरने की गुस्ताखी पर उतारू हो गया। आज इसने ऐसी जुर्रत क्यों की? अपने आप को चिकोटी काटी तो देखा सामने बादल छाये हुए हैं। मन गारों से बचा तो बादलों में खो गया। बादलों के पार वाले महल में सूरज सोया हुआ है। वहां पहुंचने के लिये कोई रास्ता नहीं, न कोई सीढ़ी, न दरवाजा, न हीं खिड़की। जो रास्ते दिख भी रहे हैं, वहां पहुंचने के लिये बहुत संकरे हैं। खिचड़ी और खीर को पतीले से निकाल कर ढोंगे में रख दिया। साथ ही सूरज की चाहना को भी तह कर संभाल दिया।