Showing posts with label baadal aangan. Show all posts
Showing posts with label baadal aangan. Show all posts

Wednesday, November 19, 2008

ये रहमत थी या उसने उलाहना उतारा

इक सुबह
मेरे आंगन में आ गया
इक बादल का टुकड़ा
छूने पर वो हाथ से फिसल रहा था
मैंने उसे बिछाना चाह
ओढ़ना चाहा
पर
जुगत नहीं बैठी
फिर
बादल को न जाने क्या सूझी
छा गया मुझ पर
मैं अडोल सी रह गई
और समा गई बादल के टुकड़े में
पता नहीं
किस टुकड़े को ओढ़ा
और कौन सा बिछ गया
मैं सिर से पांव तख
नहा गई
ये रहमत थी
या उसने उलाहना उतारा
बस सोचती रह गई