Friday, April 8, 2011
मंगलपांडेय के लिए ये प्यार नहीं तो और क्या है ?
अकसर जब हवाओं का रूख मोडऩे वाले पैदा होते हैं या यूं कहिए कि क्रांति की आंधियां चलती हैं तो उसमें यह नहीं देखा जाता है कि उसका सिरमौर कौन है ? देखा जाता है तो उस कारवां को जिसमें लोग जुड़ते चले जाते हैं और वो करवां जब अपने मुकाम को हासिल कर लेता है तो इस बात पर गौर किया जाता है कि कारवां कहां कहां से गुजरा ? उसमंे कौन कौन लोग शामिल थे ? 1857 की क्राति भी कुछ एेसी ही थी जो एक कारतूस से शुरू हुई थी। इस क्रांति में पहली शहादत मंगलपांडेय की थी, इसी वजह से मंगलपांडेय को शहर में वही सम्मान मिलता है जो आज इस क्रांति से जुड़े शहर के दूसरे लोगों को मिलता है।
मंगलपांडेय वह पहला क्रांतिकारी था जिसने चर्बी लगे कारतूस का विरोध किया था। इसी के बाद कारतूस का विरोध औघडऩाथ मंदिर पर 34 वीं देशी पैदल सेना ने किया था। कारतूस का विरोध ही आगे चल कर बहुत बड़ी क्रांति का कारण बना। भ्रांतिवश लोग यह मानते हैं कि मंगलपांडेय ने मेरठ छावनी में कारतूस का विरोध किया था। इतिहाकारों की मानें तो एेसा कोई सबूत नहीं मिलता है जो इस बात को पुख्ता करेें कि मंगलपांडेय कभी यहां आए थे। वास्तविकता यह है कि सिपाही नंबर 14४6 मंगलपांडेय 34 वीं देशी पैदल सेना के सैनिक थे जो बैरक पुर तैनात थी। यह जगह आज वेस्ट बंगाल में है। मंगल पांडेय ने पहली बार बैरकपुर में ही अंग्रेज अधिकारी पर आक्रमण किया था। इतिहासकार एस के मित्तल के अनुसार 29 मार्च 1857 को मंगलपांडेय को मंदिर में शपथ दिलायी गई थी। यह बात सच के आसपास समझी जाती है क्योंकि 1857 की क्रांति के दौरान अकसर हर समुदाय को धर्मस्थल पर ही शपथ दिलायी जाती थी। शपथ के बाद मगल पांडेय ने ह्यूसन व एक अन्य अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बाघ को जख्मी कर दिया। देश की आजादी के लिए अंग्रेज पर जो सबसे पहला हाथ उठा था, वह मंगलपांडेय का था और वो उस समय अकेला था। यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि अंग्रेजों ने मंगलपांडेय को काफी टार्चर किया तथा उसे अपने साथियों के नाम बताने के लिए दबाव बनाया लेकिन उन्होंेने किसी एक का भी नाम नहीं बताया और स्वयं आत्मघात करने की कोशिश की लेकिन अंग्रेजों ने एेसा होने नहीं दिया। मंगलपांडेय का कोर्ट मार्शल हुआ तथा एक्जीक्यूशन आर्डन नं. 28५ के हतत 8 अप्रैल 1857 को सुबह 5.३0 बजे उन्हें फांसी लगा दी गई। इस प्रकार भारतीय सशस्त्र क्रांति का पहला नायक मंगलपांडेय शहीद हो गया। इसी के बाद मेरठ में 1857 की क्रांति की लहर चली और 10 मई को इसका असली रूप देखने को मिला।
Wednesday, March 16, 2011
हम लड़कियां अपनी सुरक्षा के लिए क्या करें.......
मेरे शहर की बेटियां अब अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं . मंगल वार की सुबह सवेरे शास्त्री नगर की झलक को उसके घर में घुस कर जावेद ने अपनी हेवानियत का शिकार बनाया और उसका गला दबा कर उसे मारने का दुसाहस किया . ....चोट खाए होंठ .... गालों पर नाखूनों के निशाँ और गर्दन पर लाली तो झलक का बहरी दर्द है लेकिन उसके अन्दर का दर्द चीख चीख कर कह रहा है की हम लड़कियां अपनी सुरक्षा के लिए क्या करें.......
झलक का दोष बस इतना ही है की वो जावेद के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती थी .....आई आई ऍम टी की ये छात्र इस समाया आनंद हॉस्पिटल में अपने अंदरूनी और बाहरी दर्द के साथ जूझ रही है
आप क्या कहते हैं झलक के साथ हुए हादसे पर ......शहर की सुरक्षा पर
Thursday, February 24, 2011
पहली बार हम कहां मिले थे !
चलते चलते ..... कदम थमे..... और सवाल किया उसने..... पहली बार हम कहां मिले थे !..... मैंने कुछ सोचा...... हां ! इसी सदी की ..... तो बात है..... कुछ साल पहले..... शायद ९ /11 को..... नहीं - शायद जिस दिन मुंबई में धामाके हुए थे..... नहीं - शायद जिस दिन ..... पार्लियामेंट पर हमला हुआ था..... नहीं - जिस दिन एक कुंए में अजन्मी बेटियों के ..... भ्रूण मिले थे..... नहीं - जिस दिन ...... बाबरी मस्जिद गिरायी थी..... नहीं - तो फिर ..... बाद में बताती हूं..... kah कर मैंने उससे पीछा छुड़ाया.....
वेलेनटाइन डे जा चुका है.......
वेलेनटाइन डे जा चुका है.......लेकिन 'वेलेनटाइन डे' कहानी आज हाथ लगी। । एक दोहरी कहानी जिसमें संवेदनशीलता साथ साथ चलती है; डा. संजय को जुबैदा से प्यार होता है लेकिन हाथों में थमा दी जाती है सुनयना, इनके हाथों प्यार की ताली कभी न बजी लेकिन बच्चे होते गए, सुनयना ने एक बच्चे का नाम जुबीन रखा तो दूसरे का नाम असद; संजय को बुरा लगा लेकिन वह हमेशा उन्हें मुसलिम नामों से ही पुकारती रही जब कि संजय बेटों को अर्जुन और कार्तिक कह पुकरता रहा। , एक दिन जब संजय ने मुसलिम नामों पर टोका तो सुनयना ने अपने दिल की बात कहीं, 'आप उस दिन मेरे साथ नहीं थे, जुबैदा के साथ थे;' सुनयना की बात को ध्यान देने के बजाए संजय अपनी समानांतर दुनिया में खोया रहा और सुनयना ने अपना भरपूर विकास किया और 'जुबैदा के दोनों बेटों ' को अच्छे तरीके से पाल पोस कर बड़ा कर दिया, वेलेनटाइन डे पर उस समय संजय की आंखें खुली जब उसने महसूस किया कि प्रेम की नदी तो उसके घर में ही बह रही थी। वो व्यर्थ ही स्मृतियों में भटक रहा था। उम्र के आखिरी पड़ाव का यह मिलन सचमुच कहानी का खूबसूरत मोड़ है जो किसी के भी दिल को छू जाएगा . 'वेलेनटाइन डे' कहानी कमल कुमार की लिखी हुई है, मैंने आपसे उसका एक अंश शेयर किया है।
Sunday, February 20, 2011
छू कर भी छू न सकी .......
वो डायरी .....
जिसमें तेरे प्यार की खुशबू ....
से लिपटे ...
कुछ अक्षर ....
छिपा के रखे थे कभी ....
आज फिर मेरे हाथ लगी ....
पन्ना पल्टा .....
तेरा इश्क बैठा था हर अक्षर की ओट में .....
डायरी तो हाथ में थी लेकिन .....
अक्षर बहुत ऊँचे स्थान पर खड़े थे .....
छू कर भी छू न सकी .....
अपनी ही डायरी के अक्षरों को .....
बेदम हाथों से डायरी .....
फिर वहीँ रख दी.....
जहाँ से मिली थी .....
Saturday, December 4, 2010
बच्चे बने रहना कितना अच्छा है न .......
पिछले एक महीने से आरती मेरे साथ थी। घर में बड़ा खुशनुमा माहौल बना रहा क्योंकि अंगद की शैतानियां हर समय मुझे गुदगुदाती रहती। बीच बीच में आरती कहती रहती, गैरी की शादी के बाद पूना जा कर शिफ्टिंग करनी है। उस समय मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन कल उसका फोन आया।
'मां, आज अंगद की टीचर अंगद के स्कूल छोडऩे से बहुत दुखी हो रही थी। टीचर ने अंगद की बुक्स वापस कर दी हैं। उसके स्कूल के दूसरे सामान भी वापस कर दिए है ताकि वह अगले स्कूल में काम आ सकें। मेरी सहेलियां भी मेरे जाने की खबर से दुखी हो रही है। मेरा मन बहुत भारी हो रहा है।Ó यह कहते हुए उसकी आवाज भारी हो रही थी। अंगद तो बच्चा है, उसे किसी के दूर और पास रहने से कोई अंतर नहीं पड़ता, बस आरती और टिंकू से चिपका रहना उसे पसंद है। लेकिन आरती भी अपनी सोसायटी के परिवारों से दूर जाने से कहीं न कहीं बहुत दुखी हो रही है। उसे पिछले तीन सालों में पूना में अपना घर बड़े मन से सजाया। मैं भी एक बार देख कर आ चुकी हूं। उसका अपना सर्किल भी बना हुआ है जिसमंे कभी बर्थडे पाीर्टी तो कभी पार्टी की दूसरी वजह से लेडीज की गेट टू गेदर चलती रहती है। अब टिंकू की पोस्टिंग मुंबई में हो गई है तो उन लोगों को मुंबई शिफ्ट होना पड़ा रहा है। मैं आरती के मनोस्थिति समझ सकती हूं। उसके हाथों से सजाया हुआ उसका घर वहीं रहा जायेगा। वहां की एक एक चीज उसने शौक से तैयार करायी थी। अब वहां कोई किराएदार रहेगा। यह भी मजबूरी है। वे खुद मुंबई में किराए के फ्लेट में रहने जा रहे हैं। अपने प्यारे से घर और दोस्तों से दूर चले जाने का दर्द आरती को परेशान कर रहा है। आरती मेरी बहुत प्यारी बच्ची है। मेरी भूरे बालों वाली बेटी जिसने हमारे घर को परिवार को खुशियां दी है अंगद को हमारी जिंदगी में ला कर। उसके मन का दर्द हालांकि कुछ दिन बाद कम हो जायेगा या फिर यह भी हो सकता है कि अच्छे दोस्त मिल जाने से रहेगा ही नहीं लेकिन फिलहाल मुझे आरती का दर्द अपने सीने में महसूस हो रहा है। आज आरती और टिंकू पैकर्स के साथ बिजी हैं और अंगद भी मां से कह रहा है, मामा, पापा गोट न्यू कार एंड न्यू होम .....बच्चे बने रहना कितना अच्छा है न ।
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Tuesday, August 31, 2010
इमरोज की नजर में अमृता
जब तक सूरज आसामन में रहता है, अमृता भी आसमान में उड़ती है। निडर, मनमर्जी की रवानगी से भरपूर और दुनिया बेपरवाह सी दिन के छोटे से छोटे और दुनिया के बड़े से बड़े धमाके सेोपरवाह। दिन का अधिकांश हिस्सा वह अपने साथ रहना चाहती है। रहती भी है, लिखते हुए , पढ़ते हुए।
लेकिन रात उतरते ही वह अपने आप में उतर जाती है-ए क आम औरत की तरह से कमजोर, डरपोक, निराश और मोहताज सी। सब के लिऐ फिक्रमंद। छोटे सी आवाज पर सहम जाती है। सुहब उठते हुए उसका चेहरा बुझा बुझा सा और थका हुआ सा लगता है। जैसे वो सारी रात अंधेरे की कोई गुफा पार करके आ रही हो और वो भी अकेली। दिन चढ़ने के साथ ही उसके चेहरे की चमक भी गहरी होने लगती है , जैसे धूप ने अपने रंग उसके हवाले कर दिए हों। सुबह की किरणों में उसकी खुदमुख्त्यारी का यह हाल होता है कि दरवाजे पर पहली घंटी करने वाला भी उसके गुस्से का शिकार हो जाता है। उसके मन के एकांत को कोई खटखटा दे तो यह खटका उसकी जिंदगी में हो जाता है। उसे तो रसोई मे बर्तनों के बजने की आवाज भी नहीं सुहाती।बरतनों केबजने पर वह कहती है, क्या हम फल नहीं खा सकते। न रोटी खाएं,नही bartan झूठे हों, न वोाजें। उस समय उसकी सेवा करने वालों का सलाम भी उसे बुरा लगता है। जमादार का हाथ जोड़ना उसे बुरा लगता है। शायद यह उसकी खुदमुख्तियारी का तकाजा है कि न वो किसी के सामने हाथ जोड़ती है न उसे हाथ जोड़ने वाला अच्छा लगता है।
सादकी का आलम यह है कि उसे न नहाने का होश है न ही मेकअप की परवाह। कपड़े बदलने का भी होश नहीं रहता है। नए कपड़े खरीदने की भी वह नहीं सोचती है। जो कमीज उसे पसंद आ जाती है बस उसकी खैर नहीं। हर दिन उसे ही पहना जायेगा। उसके उधड़ने पर उसे बार बार बखिया लगाने की हद कई बार तो किसी पार्टी पर इस लिए नहीं जाती है क्योंकि उसे कपड़ेादलने पडें़गे।
एक अजीब तबियत -रोटी चाहे बसी हो या ताजी, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। बासी रोटी पर आम का आचार भी चलेगा। अंदाज होता है कि एक फकीरी उसकी रंगों में बहती है। पर कभी कभी उसकी ताीयत राजा की माफिक हो जाती है। एक दिन हम चाय पी रहे थे, चाया पीते पीते उसकी नजर एक खूबसूरत मकान पर गई, उसने में हुकुम के अंदाज ने कहा, जा कर इस मकान की कीमत पूछ कर आयो। जवाा दिया,बहुत अच्छा। उसने क बार ऐसा ही किया। करती है तथा करती रहेगी। कानों में सोने की बाली आधे घंटे से ज्यादा नहीं पहन सकती। मैंने रइस फकीरनी का भेद पा लिया। हीरा मोती नीलम और पुखराज उसके लिए नहीं बने हैं। कनॉटप्लेस में हीरों की दुकान के सामने से गुजरती है, उसकी बादशाहत तबियत उसे दुकान के अंदर खींच लेती है। हीरे मोती, पुखराज और ऐसे ही कीमती पत्थर वह देखती है तो देखती ही रह जाती है। उस समय उसका चेहरा जगमगाने लगता है हीरों से भी ज्यादा। वैसे उसने खरीदा कुछ भी नहीं है। उसे पता है कि यह जेवर और हीरे मोती उसके लिए नहीं है।अगर कोई जेवर वह पहन भी लेती है तो शीशे के सामने जा कर कहती है, ये तो मैं नहीं हूं, और उस समय वह जेवर उतार कर रख देती है। उसे अपना चेहरा खुद को ही पहचान में नहीं आता है। कभी घड़ी पहनती थी लेकिन आ वक्त देखना ही नहीं है्र सो घड़ी भी नही पहनती। वक्त मेरे से पूछ लेती है।
तसुर से माला माल यह शायरा अगर सचमुच अमीर होती तो पता नहीं, कितने सुंदर घर और हीरे मोतियों का मालकिन होती।
ये फकीरनी नाजुक मिजाज भी बहुत है तो पोजेसिव भी। इसके मकान में कोई भी कील तक नहीं गाड़ सकता है। अगर किसी ने ऐसा करने की कोशिश की तो ये जख्मी शेरनी की तरह से उस पर टूट पड़ती है।
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