दोस्तों , समाज में बेमेल विवाह हर दौर में होते रहे हैं , अभी भी जारी है। कभी किसीोटी को मजाूरी में तो किसीोटी को जानाूझ कर तिगुनी उम्र के मर्द के साथ जोड़ दिया जाता है। चंो की पहाड़ियों में रहने वाली लूना ऐसा ही चरित्र है जिसे अपनी कलम से कई कलमकारों ने छूने का प्रयास किया है। दरअसल, लूना को उस व्यक्ति के लड़ बांध दिया जाता है जिसका बेटा लूना के बराबर का है। लूना के पिता की भी मजाूरियां रहीं होंगी लेकिनोमेल विवाह ने लूना को कैसे हर दिन तोड़ा, इसका जिक्र जा काव्य रूप में पंजाा के कवि शिव कुमाराटालवी ने किया तो वह पजाां की लोकगाथा साान लोगों की जुाां वर चढ़ गया। आज शिव कुमाराटालवी का जन्म दिन है। लूना का जिक्र मैं इस लिए कर रही हूं क्योंकि शिव ने एक मर्द हो कर भी लूना के दर्द को समझा और उसे शदों से अपने काव्य में पिरो दिया। लूना का दर्द शिव के शदों इस तरह से उभरा कि लूना काव्य ग्रंथ ने शिव को रातों रात कवियों की पहली कतार में खड़ा कर दिया। शिव को लूना के लिए 1965 में साहित्य एकेडमी पुरस्कार भी मिला। मात्र 28 वर्ष की उम्र में साहित्य एकेडमी अवार्ड लेने वाला शिव पहला कवि है।
आ हम बात करते हैं लूना के दर्द की, जो कभी उसके दिल में ओने बाबुल के लिए उठा तो कभी बाबुल की रसोई के चूल्हे में जला। लूना को शिव ने बड़े अनोखे ढंग से पेश किया है। लूना के दर्द को उजागर करने के लिए शिव ने लूना से ही उसकी सखियों को संोधित करवाया। कभी शादी के रिश्ते कीाात शुरू होने पर तो कभी विवाह के मौके पर। कभी लूना के पति के साथ साथ रहते रहते । आज शिव को याद करते हुए मैं कुछ उन पलों का अनुवाद प्रस्तुत करने जा रही हूं जहां लूना का ही नहीं हर उस औरत का दर्द समझा जा सकता है जो लूना जैसी परिस्थितियों से गुजरी है।
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सखियो......
मैं आग चली परदेश......
आग चली परदेश......
एक छाती में हाड तपता.......
एक छाती में जेठ........
ओ मैं आग चली परदेश.......
आग की उम्र में.......
हर आग........
ja baithati है pardesh......
हर आग के.......
ाााुल के चूल्हे.......
सदा न रहता उसका सेक.......
हर आग के.........
ाााल की जायी.......
चली जाए परदेश.......
यह क्या आग के लेख.......
सखियो.......
ये क्या आग के लेख......
हर घर की कंजक.......
पर जा आती है आग की रूत.......
हराााुल......
वर खोजन निकले......
हर आग सा मेल......
हर आग ही छोड़ जाए.......
सखियो......
हराााुल का देश.......
लगा हाथों पर जलती मेहंदी......
पहन का आग का भेष......
मैं आग चली परदेश......
पर सखियो.......
मैं कैसी आग हूं........
कैसे मेरे लेख.......
तो मुख का सूरज जलता......
दूजा जले पांव तले.......
तीजीौठी........
देह के आंगन में......
फिर भी सखियो.........
ाुझता जाता......
इस अगन का सेक........
जोाााुल वर........
खोज लिया.......
वो न आया मेरे मेल.......
मैं आग चली परदेश......
सुनो सखियों........
आग के दर्द को कौन सुने......
आग के दर्द को कौन पहचाने.......
आग के दुख को जाने कौन......
सखियो......
जा भी आग जन्म लेती है......
आग की अांरी रो पड़ती है........
कोख में सोची थी पुत्र की खुशाू.......
पर आग जन्मी.......
आग देख अमड़ी का दूध सूखे.........
और कलेज में होल उठे ......
ाााुल की पगड़ी होतीोरंग......
......
कितनीाुरी सोच पड़ती है......
जन्म दिहाड़े से......
द्वार सेािदा करने की.......
चिंता पड़ती है......
यहां लूना अपने आप को आग कहती हुई अपनी aapa biti कह रही है। सच, उसके दर्द कोई थाह नहीं है लेकिन इन पंक्तियों को आप क्या कहेंगे जिसमें शिव कुमार ने शायद अपना भी दर्द जोड़ दिया है।
-----------
ओ सखियो......
री कुजिओ (चााियो).......
मुझे ऐसा ताला मारो.......
न वो खुले......
न वो टूटे.......
चाहे लाख हथौड़े मारो......
----------
शिव की लूना पढ़ कर लूना का दर्द हर औरत के दिल में कुदालें चलाता है। शिव कुमार के जन्मदिन पर सभी कलमकारों का शिव को नमन।
Friday, July 23, 2010
बिरहा के सुल्तान शिव तुम्हें लूना याद करती है ........
दोस्तों , समाज में बेमेल विवाह हर दौर में होते रहे हैं , अभी भी जारी है। कभी किसीोटी को मजाूरी में तो किसीोटी को जानाूझ कर तिगुनी उम्र के मर्द के साथ जोड़ दिया जाता है। चंो की पहाड़ियों में रहने वाली लूना ऐसा ही चरित्र है जिसे अपनी कलम से कई कलमकारों ने छूने का प्रयास किया है। दरअसल, लूना को उस व्यक्ति के लड़ बांध दिया जाता है जिसका बेटा लूना के बराबर का है। लूना के पिता की भी मजाूरियां रहीं होंगी लेकिनोमेल विवाह ने लूना को कैसे हर दिन तोड़ा, इसका जिक्र जा काव्य रूप में पंजाा के कवि शिव कुमाराटालवी ने किया तो वह पजाां की लोकगाथा साान लोगों की जुाां वर चढ़ गया। आज शिव कुमाराटालवी का जन्म दिन है। लूना का जिक्र मैं इस लिए कर रही हूं क्योंकि शिव ने एक मर्द हो कर भी लूना के दर्द को समझा और उसे शदों से अपने काव्य में पिरो दिया। लूना का दर्द शिव के शदों इस तरह से उभरा कि लूना काव्य ग्रंथ ने शिव को रातों रात कवियों की पहली कतार में खड़ा कर दिया। शिव को लूना के लिए 1965 में साहित्य एकेडमी पुरस्कार भी मिला। मात्र 28 वर्ष की उम्र में साहित्य एकेडमी अवार्ड लेने वाला शिव पहला कवि है।
आ हम बात करते हैं लूना के दर्द की, जो कभी उसके दिल में ओने बाबुल के लिए उठा तो कभी बाबुल की रसोई के चूल्हे में जला। लूना को शिव ने बड़े अनोखे ढंग से पेश किया है। लूना के दर्द को उजागर करने के लिए शिव ने लूना से ही उसकी सखियों को संोधित करवाया। कभी शादी के रिश्ते कीाात शुरू होने पर तो कभी विवाह के मौके पर। कभी लूना के पति के साथ साथ रहते रहते । आज शिव को याद करते हुए मैं कुछ उन पलों का अनुवाद प्रस्तुत करने जा रही हूं जहां लूना का ही नहीं हर उस औरत का दर्द समझा जा सकता है जो लूना जैसी परिस्थितियों से गुजरी है।
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सखियो......
मैं आग चली परदेश......
आग चली परदेश......
एक छाती में हाड तपता.......
एक छाती में जेठ........
ओ मैं आग चली परदेश.......
आग की उम्र में.......
हर आग........
ja baithati है pardesh......
हर आग के.......
ाााुल के चूल्हे.......
सदा न रहता उसका सेक.......
हर आग के.........
ाााल की जायी.......
चली जाए परदेश.......
यह क्या आग के लेख.......
सखियो.......
ये क्या आग के लेख......
हर घर की कंजक.......
पर जा आती है आग की रूत.......
हराााुल......
वर खोजन निकले......
हर आग सा मेल......
हर आग ही छोड़ जाए.......
सखियो......
हराााुल का देश.......
लगा हाथों पर जलती मेहंदी......
पहन का आग का भेष......
मैं आग चली परदेश......
पर सखियो.......
मैं कैसी आग हूं........
कैसे मेरे लेख.......
तो मुख का सूरज जलता......
दूजा जले पांव तले.......
तीजीौठी........
देह के आंगन में......
फिर भी सखियो.........
ाुझता जाता......
इस अगन का सेक........
जोाााुल वर........
खोज लिया.......
वो न आया मेरे मेल.......
मैं आग चली परदेश......
सुनो सखियों........
आग के दर्द को कौन सुने......
आग के दर्द को कौन पहचाने.......
आग के दुख को जाने कौन......
सखियो......
जा भी आग जन्म लेती है......
आग की अांरी रो पड़ती है........
कोख में सोची थी पुत्र की खुशाू.......
पर आग जन्मी.......
आग देख अमड़ी का दूध सूखे.........
और कलेज में होल उठे ......
ाााुल की पगड़ी होतीोरंग......
......
कितनीाुरी सोच पड़ती है......
जन्म दिहाड़े से......
द्वार सेािदा करने की.......
चिंता पड़ती है......
यहां लूना अपने आप को आग कहती हुई अपनी aapa biti कह रही है। सच, उसके दर्द कोई थाह नहीं है लेकिन इन पंक्तियों को आप क्या कहेंगे जिसमें शिव कुमार ने शायद अपना भी दर्द जोड़ दिया है।
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ओ सखियो......
री कुजिओ (चााियो).......
मुझे ऐसा ताला मारो.......
न वो खुले......
न वो टूटे.......
चाहे लाख हथौड़े मारो......
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शिव की लूना पढ़ कर लूना का दर्द हर औरत के दिल में कुदालें चलाता है। शिव कुमार के जन्मदिन पर सभी कलमकारों का शिव को नमन।
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शिव कुमार बटालवी
Saturday, June 5, 2010
देवता तो हमारे अन्दर ही बसते हैं ....नजर की जरूरत है
काया विज्ञान का एक बहुत प्यारा सा हवाला एक जगह मिलता है . जब परमात्मा ने सब देवता पैदा कर लिए तो उन्हें धरती पर रहने के लिए भेज दिया .....वहां रहने के लिए उन्हें सुन्दर स्थान चाहिए था . आहार भी चाहिए था . वे फिर लौट कर परमात्मा के पास गए और अपनी समस्या उनके सामने रखी ......तो परमात्मा ने इंसानों की ओर इशारा करते हुए कहा ....तुम सब वहीँ रहो और अपना स्थान खोज लो. परमात्मा का आदेश पा कर देवता ने वाणी बन कर मुख में परवेश किया.....वायु बन कर प्राणों में. सूर्य देवता ने आँखों में स्थान ग्रहण किया . दिशा देवता ने कानों में तथा ब्रहस्पति देवता ने काया के रोम रोम में और चन्द्र देवता ने ह्रदय में अपना स्थान बना लिया .......देवता इन्सान की देह में ही वास करते हैं.....यह भी सच है की सही भोजन न करने से ये तत्व कमजोर पड़ जाते हैं और देवता मूर्छित पड़े रहते है .......
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आज जब में ऑफिस के लिए विशवविद्यालय के सामने से गुजर रही थी तो मुझे वहां किताबों का एक स्टाल दिखा ..अमृता प्रीतम की लिखी हुई किताब "अक्षरों की अंतर्ध्वनि" मुझे स्टाल पर मिल गई.....यह किताब जून १९९० में सूचना एवं प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित की गई थी.....मात्र १५ रूपये की ये किताब मेरे लिए बेशकीमती है ...... काया विज्ञान की कुछ पंक्तियाँ आपसे शेयर कर रही हूँ ......उम्मीद करती हूँ ......आपको पसंद आएँगी .
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Sunday, April 11, 2010
एक याद ....एक दीप ....एक टीस....
मेरे साथ ही क्यों , अकसर कवरेज कर रहे मीडिया परसन को ऐसी दिक्कत आती होगी , जैसे कि शनिवार की शाम को मैंने फेस की।
10 अप्रैल की शाम को विक्टोरिया हादसे की चौथी बरसी का आयोजन था। शहर भर के लोग हादसे में चले गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए एक दीप समाधिस्थल पर जलाने के लिए पहुंचे हुए थे। वहां वो लोग भी थे जिनके घर से परिजन हमेशा के लिए जुदा हो चुके थे। अपनों को गंवा चुके लोगों की आंखों के आंसू थे कि थम नहीं रहे थे। बेहद गमगीन माहौल में मैं एक पल को भूल गई कि मुझे इस मौके की कवरेज भी करनी है। मन बेहद भारी हो उठा। मेरी बगल में आंसू पौछती महिला मुझसे बोली, क्यांे आप इस दिन को अखबार की सुर्खियां देते हों। क्यों हमारे जख्मों को कुरेदते हो, प्लीज हमें हमारे दुखों के साथ जीने दो।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उसकी बात में क्या सफाई दूं, क्या जवाब दूं।
तभी मेरी नजर कुछ छोटे बच्चों पर गई जो समाधिस्थल पर फूल चढा रहे थे, कैंडल जला रहे थे। कभी नही आने वाले इनके परिजन जरूर इन्हें देख रहे होंगे कि ये बच्चे सच्चे मन से उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं।
Sunday, April 4, 2010
कोई अधिकार नहीं..... कोई उलाहना नहीं
तुम्हें अगर मेरी जरूरत होती तो तुम मुझे इन राहों पर अकेली न छोड़ते । एक लंबे काल तक मैं अपने आप से ही बातें करती रही। कभी तुम्हारे भीतर जा कर सवाल करती तो कभी अपने अंदर से जवाब तलाषती। पर मेरी तुम्हारी चुप सी बातें मेरे अंदर जवान होती और कुछ समय बाद वहीं दम तोड़ देतीं। अरसा गुजर चुका है। अब तुम मेरे लिए ऐसे हो गए हो जिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं, कोई उलाहना नहीं। मोहब्बत तो मैं अब भी तुम से उतनी ही करती हूं पर इस तरह से नहीं जैसे कोई औरत एक मर्द से करती है, बल्कि इस तरह से जैसे कोई इंसान रब से करता है। तुम इसे समझ सकोगे या नहीं, नहीं जानती ..........
दरअसल , मैं अंदर से और ----बाहर से और -----हो कर जीना नहीं चाहती, इसी लिए मैंने उस गांठ को खोल दिया है जिसके अंदर रह कर मैं कुछ और रहती हूं, बाहर रह कर कुछ और। मैं आंखें बंद कर के कुछ और सोचती हूं और आंखें खोल कर कुछ और देखती हूं। ऐसी गांठों को खोलना आसान नहीं होता है लेकिन अब मैंने इन्हें खोल दिया है, कई warsh लगा दिए इस गांठ को खोलने me .......अब जो मैंने किया है, वह केवल इस लिए,ताकि मैं किसी और से , खुद से झूठ न बोलूं ....... तुम्हारे साथ गुजारा हुआ वक्त अब मुझे सपने में भी नहीं सोचना है। यह सब मैं अपने लिए कर रही हूं। अपनी आत्मा को दागी होने से बचाने का एक प्रयास है। औरत का इससे बड़ा दुख और कुछ नहीं हो सकता है कि उसके सपनों को उसकी जुबान के सामने मुकरना पड़े। मुझे दुनिया के सुखों की चाह नहीं हैं। मेरे मन के सुख मेरी तरह से कुछ अनोखे हैं। षायद तुम समझ पाते । समाज के कानून से लिथड़ी हुई त्यौरियां मैं सहन नहीं कर सकती। आज तुम बेखबर हो कर सोए हुए हो। ऐसा लगता है जैसे तुमने कालों के बाद ऐसी नींद ली है। तुम्हारा चेहरा कह रहा है, तुमने सालों बाद भूख का व्रत तोड़ा है क्योंकि एक भरपूरता चमक रही है। ----------------- दोस्त की डायरी के कुछ अंश
Wednesday, March 31, 2010
मुद्दत बाद .....उम्रें ठहर गईं
मुद्दत बाद ......उम्रें ठहर गईं
उनकी नजरें मिलीं .......एक दूसरे को देखा , जैसे तपती गर्मी में ठन्डे पानी के घूंट भर लिए हों ।
पर ये क्या , उनकी प्यास तो वैसे ही धरी हुई थी ।
वो दिन , वो घडी , वो पल ऐसे गुजरा जैसे वो मेले में हैं ..... मेले के हिंडोले में अपनी उम्रों को बैठा कर हिलोर दे रहें हों । और वो दोनों उस पल, उस घडी और उस दिन के देनदार बन गये । अगले ही पल उन्हें हिंडोले से उतरना था । मेले से चले जाना था । उन्हें गम नहीं था । उन्होंने मेला मना लिया था । मेले की मिठाई चख ली थी । अब तो उन्हें अपने-अपने अरमानों की तह लगा कर रखनी थी।
फोटो गूगल से साभार
Monday, March 29, 2010
अपनी आंख के श्राप को क्या कहूँ .....
ईश्वर की ऑंख ईश्वर के चेहरे पर हो तो वरदान है, लेकिन इन्सान के चेहरे पर लग जाए तो शाप हो जाती है .....अपनी आंख को क्या कहूँ ........
कभी कभी ये श्राप मेरी आंख को लग जाता है ..... कई बार ......
उस दिन भी वही हुआ ......
उस दिन .......
थाने के कंट्रोल रूम में बेठी तीन लड़कियां ......मीडिया के फ्लेश बार बार क्लिक किये जा रहे थे .....खाकी वर्दी वाले ने पूछा ......धंधा करती हो क्या ?एक लड़की ने कहा .... नहीं साहब ....में तो अपनी मौसी के पास रहती हूँ बाकी की दो लड़कियां रोये जा रहीं थी .....वो तीन लड़कियां .....जो १४ साल से भी कम की रही होंगी .......सवाल पे सावल .....हर जवाब में आंसुओं का सैलाब .........
और शाम को उन्हें नारी निकेतन भेज दिया गया .......कुछ दिन बाद मौसी उन्हें से ले गई उसी दुनिया में...... जहाँ जिस्म के सौदागर आते है
Friday, March 26, 2010
दो सहेलियां ....एक देह में रहती हैं
दो सहेलियां
एक दूसरे की साथी
दो सहेलियां
एक , एकांत में जागती है
एक ,एकांत में सोती है
सोने वाली जागने वाली से ऑंखें चुराती है
जागने वाली सोने वाली को उलाहना देती है
सोती , सोती क्या है
ऑंखें चुराती है
जागती , जागती क्या है
खुली आँखों से जंगल उगाती है
उन्हीं जंगलों में घूमती है
दो सहेलियां
एक ही देह में रहती हैं
साथ साथ
दुःख कुरेदती हैं
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