Friday, March 26, 2010

दो सहेलियां ....एक देह में रहती हैं

दो सहेलियां

एक दूसरे की साथी
दो सहेलियां
एक , एकांत में जागती है
एक ,एकांत में सोती है
सोने वाली जागने वाली से ऑंखें चुराती है
जागने वाली सोने वाली को उलाहना देती है
सोती , सोती क्या है
ऑंखें चुराती है
जागती , जागती क्या है
खुली आँखों से जंगल उगाती है
उन्हीं जंगलों में घूमती है
दो सहेलियां
एक ही देह में रहती हैं
साथ साथ
दुःख कुरेदती हैं

Thursday, February 18, 2010

उसकी प्यास न पानी बनी न आग

उस रात .....................

वो अकेली नहीं ...........................

उस के साथ रात भी जली थी .......................

मैंने उसे आग अर्पित की ..........................

वो और भी सर्द हुई ................................

समन्दर की बात की .............................

तो वो और भी खुश्क हुई ................................

उस की प्यास न पानी बनी ................................

ना आग .....................................

उसके दोष अँधेरे नहीं .................................

रौशनी थे ..............................

उसकी भटकन केवल रिद्हम थी ............................

जब साज निशब्द हुए ..................................

तो वो मीरा बनी ...................................

राबिया हुई ...................................

आखिर .........................................

मंदिर का प्रसाद हुई .........................................

मस्जिद की दुआ हुई ...................................................

पत्र का शीर्षक क्या होगा ?

तुम्हारी किताब छपी ......तुम अरसे तक मुझे खोजती रहीं ......किताब देने के लिए। और फिर किताब दी भी। तेरी मेरी पहचान बस इतनी ही थी। छोटी सी। मै अपनी किताब की समीक्षा और टिप्पणी के लिए किसी महिला आलोचक / साहित्यकार चाहता था । मेरे दोस्त ने तुम्हारा जिक्र किया। तुमने किताब का प्रूफ पड़ कर टेलीफोन पर ही चार पंक्तियाँ लिख दी। मैंने वो चार पंक्तियाँ श्रृंगार समझ कर किताब में सजा ली। बस ऐसी ही थी हमारी जान पहचान। मेरी क्या ओकात ....मुझे कोई कम ही अपनी किताब देता है । तेरी किताब हाथ आते ही पड़नी शुरू कर दी । जैसे जैसे पड़ता गया....एक जख्मी रूह सामने साफ होती गई जिसके हाथ में शब्द और अहसास की तलवार पकड़ी हुई थी । रूह के सामने मैदाने जंग था और पीछे छोड़ आई थी एक संसार । शायद ऐसे ही पलों ने उसे शायरा बना दिया था और खुले आसमान में उड़ने शक्ति थमा दी थी । बेटियां चाहे हमेशा ही अपने दुःख दर्द माँ के साथ सांझे करें लेकिन कभी कभी दुखों की लकीर बाप रूपी दोस्त को भी चुभ जाती है दुखों की इस लकीर ने ही तुम्हारी नज्मों को चार चाँद लगाये हैं । मुझे पता नही ...मैं तुझे क्या आशीर्वाद दूँ...अतीत के पल सपने बन जाएं ......भविष्य चमक जाए ....अपने मोह में गूँथ कर मै यही आशीर्वाद देता हूँ .....तुम इसे जैसा चाहो ......इस्तेमाल कर लो एक पत्र की बात

Tuesday, January 26, 2010

इमरोज ......इक लोकगीत सा

एक साया जो सपने में उतरने लगा था....कुछ पहचान नहीं आ रही थी कि किसका साया है। दिखायी देता है कि एक अकेला मकान है, आसपास में कोई बस्ती नहीं है.....उस मकान की दूसरी मंजिल पर एक खिड़की है जिसमें कोई खड़ा है कंधों पर ‘ााल डाल कर। खिड़की के पास रखी मेज पर बड़ा सा कैनवास है जिस पर पेंटिंग बनी हुई है, पर दिखायी नहीं दे रही है। यह अमृता का सपना है जो उन्हें कई वशोZं तक आता रहा...... अमृता को जब इमरोज मिले तो इस सपने का अर्थ समझ आया लेकिन फिर कभी ये सपना भी नहीं आया। मुझे याद है जब मैं पहली बार इमरोज से मिली थी, उस समय अमृता जी जीवित थी। इमरोज जी उस दिन ‘ााल ओड़े हुए थे। अमृता जी का सपना अचानक मेरी सोचों पर उतर आया। इमरोज जो अमृता की जिन्दगी में एक ऐसी बहार बन कर आए जिसकी खुशबू आज भी बरकार है। आज इमरोज का जन्मदिन है। अपनी इस नज्म में इमरोज अपने आपको कुछ तरह से बयान करते हैं। मैं एक लोक गीत बेनाम हवा में खड़ा हवा का हिस्सा जिसे अच्छा लगे वो याद बना ले और अच्छा लगे तो अपना ले जी में आए तो गुनगुना ले मैं इक लोकगीत सिर्फ इक लोक लोकगीत जिसे नाम की कभी दरकार नहीं

Tuesday, January 5, 2010

अब वो शांत था ......

उस दिन बेहद कोहरा था । कोहरे से भरे बादल बार बार गाड़ी के सामने वाले शीशे से टकरा रहे थे लेकिन उसे मंजिल पर पहुचने की बहुत जल्दी हो रही थी । गाड़ा कोहरा गाड़ी को स्पीड में आने ही नहीं दे रहा था । सामने एसा लग रहा था जैसे किसी ने धुयाँ धुयाँ छोड़ दिया हो । तभी कोहरे का एक बादल आया और उसने सड़क की सफ़ेद पट्टी को पूरी तरह से दबा दिया ...... गाड़ी को ब्रेक लगाने पड़े ...... इसी बीच मोबाईल बज गया। उसने काल सुनने के बाद गाड़ी मोड़ ली । अब वो शांत था ।

Thursday, December 17, 2009

उस खबर के अक्षर और उनकी अजमत

बात बहुत पुरानी है......... मेरे पुराने घर के सामने एक क्रिस्चयन परिवार रहता था। उनके घर के एक बुजुर्ग सड़क पार वाली सामने की चाय की दुकान पर बैठे रहते थे। एक दिन उनकी बहू मुझसे मिलने दोपहर को आई। मैं दोपहर में लंच के बाद ऑफिस के लिऐ निकलने को तैयार थी। कहने लगी , एक बच्ची है, उसे आपसे मिलाना है। कुछ ही देर में वह बच्ची को ले आई। कहने लगी, ये बच्ची रेलवे रोड पर अकेली जा रही थी, पता नहीं कहां की है, कुछ बता ही नहीं रही है। मेरे ससुर इसे ले आए थे, आप इसके बारे में कुछ लिख दो, हो सकता है, इसके घर के लोग इसे मिल जाए। मैंने लड़की से पूछा कि वह कहां की रहने वाली है लेकिन उसने कुछ ठीक से बताया नहीं। लड़की की उम्र यही कोई नौ दस साल की होगी। मै हैरान थी कि लड़की इतनी छोटी भी नहीं थी कि अपना पता न बता सके, फिर भी मैंने उससे बातचीत शुरू की .......उसने अपने बारे में नाम के सिवाय और कुछ भी नहीं बताया। खैर, मैंने उसका फोटो करवा कर उसके बारे में जो भी जानकारी क्रिस्चयन परिवार ने दी, नोट कर ली। चलते चलते , मैंने उससे कहा, अपना नाम लिख कर दिखाए, उसने एक दम से कलम उठाया और कागज पर पास ले जाने पर बाद रोक दिया। कुछ लिखा नहीं....मुझे ये बहुत अजीब लगा .... मैंने आफिस में जा कर एक चार कालम की खबर बना दी। दूसरे दिन क्रिस्चयन की बहू मेरे पास भागी भागी आयी और कहने लगी कि अखबार में पढ़ने के बाद उस बच्ची प्रीति के घर से उस लेने आए हैं। सदर थाने की पुलिस भी आयी हुई,आप भी साथ चलो। मैं गई तो प्रीति पुलिस के बीच घिरी बैठी थी। थोड़ी सी औपचारिकता के बाद पुलिस ने प्रीति को उसके घर वालों के हवाले कर दिया। मुझे खुशी हो रही थी कि एक चार कालम की खबर के कारण प्रीति को उसके माता पिता मिल गये थे।आज अचानक से प्रीति के माता पिता मेरा पता खोजते हुए आए। मुझे प्रीति शादी का कार्ड देने के लिए। प्रीति के पिता ने बताया कि उस दिन प्रीति एक छोटी सी बात पर नाराज हो कर बुलंदशहर से गाड़ी में बैठ कर मेरठ आ गई थी। आप उस दिन खबर न लिखती तो पता नहीं प्रीति कभी घर भी वापस लौट पाती या नहीं। प्रीति तो पूरी तरह से तैयार थी वो कभी घर न लौटे, इसी लिए तो उसने आपको कागज पर कुछ भी लिख कर नहीं दिखाया था।

Thursday, December 10, 2009

ये भी भला कोई वक्त है ......अब आने का

ये भी भला कोई वक्त है
अब आने का
न तारों की छांव
न गुनगुनी धूप की छत
न हवा में मस्तियाँ
न बरसात की मदहोशियाँ
न ही तेरे आने का कोई इन्तजार
...........
अरसा पहले लिखा था इस नज्म को
फोटो गूगल से साभार