Wednesday, June 24, 2009

उधड़े हालात सिलती ... ........वो लड़की

वो लड़की ........ जो हर वक्त अपने घर के कच्चे आंगन में बैठी बड़े ध्यान से उधड़े हुए हालात सीती रहती है। इस कदर ध्यान से सीने काम करती है कि लगता है , धागा खुद ब खुद कपड़े पर उगता चला जा रहा है। दिल कहता है...... दुआ भी एक धागा है जिससे बंदे का रब से सिला जुड़ा रहता है। दुआ के कई रंग हैं , धागों की तरह । जो धागे सिर्फ ख्चाहिशों की मांग के रंग से रंगे रहते हैं , उन धागों से काढ़ी गई दुआ के रंग अलग से होते हैं लेकिन जिन रंगों पर रब की मोहब्बत का रंग चढ़ा होता है , उनसे काढ़ी गई दुआ की खुशबू आती है। दुआ की छांव में बैठ कर कुछ मांगना जरूरी नहीं है, इस छाव में छिपे हुए खूबसूरत सफर की आहट सुनना भी खास है। वो लड़की, बहुत कुछ सिखाती है। वो लड़की , रब सरीखी मोहब्बत की बेल काढ़ रही है। मोहब्बत की गलियों की धूल बुहार रही है उस लड़की को यकीन हैं..... कभी तो वो आयेगा...... यहां कदम रखेगा......

Sunday, May 24, 2009

जिन्दगी के कुछ टुकड़े ......जो गिर गए कहीं

मेरा एक टुकड़ा मैले दिनों की सीड़ियों में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा खुश रंग आंखों के प्याले में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा बरसात के मौसम में , जुदायी में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा एक छोटी सी भूल के किनारे गिर गया है।मेरा एक टुकड़ा खामोशी के बीच गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा टूटे हुए वायदे में गिर गया है। मेरा एक हिस्सा सच के सवाल के किनारे गिर पड़ा हैं। मेरा एक टुकड़ा ........ओह ! अब कैसे कहें..... क्या क्या कहें......? कहां कहां ढूढें़ हम अपने टुकड़े................... किसी की लिखी हुईं इन पक्तियों को पढ़ते पढ़ते पता नहीं क्यों किसी जंगल में कई काल, कई जन्म चलते जाने का अहसास होता है।
अरसा पहले एक नज्म लिखी थी......
जिस घड़ी हमने हंसना था खिलखिला कर

उस घड़ी हमने अपने सांसों की आवाज को
अपनी मुठ्टी में कस कर पकड़ लिया
और देखते रहे ---सूरज का बेअवाज सफर पड़ों की बेआवाज सरसराहट

Monday, May 4, 2009

पेड़ .......जिस पर अभी अभी बौर आया

मेरे शहर में एक प्यारी सी लड़की थी ......डी फार्मा की छात्रा , जिसने प्यार में धोखा मिलने पर अपनी जान गंवा दी। अपने प्रेमी के लिए उसका आखिरी नोट कुछ इस तरह से था............''मैं तुम्हें प्यार की तरह से प्यार नहीं करती , मैं तुम्हें देवता समझती थी। तुमने शादी करके दिखा दिया कि प्यार हमेशा बराबर वालों के साथ किया जाता है। हम ही गलत थे। एक बार यह तो देख लेते, तुम हमारे दिल में किस जगह रहते थे।''

.......... पता नहीं उम्र कच्ची थी या प्यार का रंग लेकिन प्यार रूसवा हो गया।

अरसा पहले एक नज्म यूं ही लिखी थी, नहीं जानती आज क्यों फिर वह नज्म जेहन में हावी हो रही है।

एक ख्याल

उगते सूरज सा ख्याल

पहली बार ख्याल से सामना हुआ

उस पेड़ के नीचे

जिस पर अभी अभी बौर आया था

ख्याल बौर से खेलने लगा

वो तपती दोपहरी थी

ख्याल के साथ आन खड़ा हुआ एक साया

हवा चली

बौर के कुछ अंश साये पर बिखरे

साये में कंपन हुआ

कायनात महक उठी

डाल पर बैठा परिंदा देख रहा था

कंपन

कायनात का महकना

और दूर से आता तूफान (अगला अंश फिर कभी ..................)

Sunday, April 26, 2009

टेड़ी सिलायी उधड़ा बखिया ...ये जीना भी कोई जीना है

कल उसकी नौकरी चली गई। बैंक की नौकरी। अकसर मेरी उससे बात होती थी। कभी बैेंक काउंटर पर तो कभी बैंक के काम से। काफी अच्छे घर की बच्ची थी। नौकरी गंवाने के दो दिन बाद वह मेरे पास आई। बोली.......मुझे अहसास भी न था कि ऐसा हो जायेगा.....नौकरी जाने का गम नहीं है.......इसकी वजहों से मन परेशान है........मैंने पूछा क्या.......बोली.......कुछ लोग नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूं........ मुझे पद्मा सचदेव, ढोगरी ‘ाायरा की याद आ गई। जब वे जम्मू रेडियो स्टेशन पर काम करती थीं, उन दिनों उन्होंने कवि सम्मेलनों में जाना ‘ाुरू कर दिया था। बाद में कुछ लोगों ने जम्मू स्टेशन को लिखा कि इन्हें नौकरी से निकाला दिया जाए, इनके रहने से रेडिया स्टेशन की बदनामी हो रही है........पद्मा जी ने इस दर्द को कुछ इस तरह से लिखा.............. मैं आसमान को कैसे थाम लूं... चांदनी को कैसे गले लगायूं.... और आगे लिखा... टेड़ी सिलायी उधड़ा बखिया.... ये जीना भी कोई जीना है ....

Monday, April 20, 2009

वक्त खड़ा देखता रहा खुले जख्म को.........

चुप सी रात में

यादों के रेले में

अंदर कुछ तिड़का

वो जख्म खुल गये थे

जो सिल दिये वक्त ने

रेले से एक साया निकला

हाथ बढ़ा कर

उसने जख्मों से धागा निकाल दिया

वक्त खड़ा देखता रहा खुले जख्म को

और साया रेले में गुम हो गया

Friday, April 10, 2009

अक्षर......जो भीतर में उतर आते हैं.......

` वो है ` और ´वो था,` इसके बीच का फासला केवल दुनिया का बनाया हुआ है, मोहब्बत करने वाले यह फासला नहीं मानते हैं........... दिल की मिट्टी में जब किसी का नाम अंकुरित हो जाता है.........जब उसकी पहचान पनप जाती है तो पेड़ की ‘ााखा कटने के बाद भी सलामत रहती है। जहां चिंतन का बौर उसी तरह से पड़ता है, अनुभव की पत्तियां उसी तरह पनपती हैं और खामोशी की खुशूब उसी तरह से उठती है......अमृता जी इस बारे में एक बहुत अच्चा और रूहानी जज्बा रखती हैं, उनके कहे अनुसार, जिसने भी रजनीश को पाया है,उसके लिये रजनीश कभी ´था ` नहीं हो सकता है........ वो हवा में है, जिसमें सभी सांस लेते हैं....... रजीनश की बात वो इस तरह से कहती हैं.......किताबों में पड़े हुए अक्षर मर जाते हैं, इस लिये किताबों की बात नहीं, उन अक्षरों की बात है जो अपने भीतर उतार लिये हैं.......जो भीतर में बो दिये हैं.......अक्षर......जो भीतर में उतर आते हैं.......वो मरते नहीं और .....वो धड़कते हैं .....दिलों में बस जाते हैं अमृता जी को पता था कि आगे क्या होने वाला है, इसी लिये उन्होंनें ऐसी बात कही...... .......और अब, इमरोज कभी अमृता जी को `थी´ करके नहीं बुलाते हैं, जब भी बात होती है, वे उन्हें `हैं´ करके ही बात करते हैं....... वो हमारे साथ ही हैं, उनकी बातें मुझे क्योें कर आज याद आ गई........आज विक्टोरिया पार्क अग्निकांड को तीन वशZ हो गये, उस स्थल पर आज उन सभी को याद किया गया जो इस हादसे में गुजर गये। वहीं किसी ने कह दिया, अग्निकांड में जाने वाले कहीं गये नहीं हैं, यहीं हैं यानि कि `हैं´ धड़कते अक्षरों की तरह से........

Wednesday, April 1, 2009

रह गया तेरे होने का जिक्र.........

रह गया तेरे होने का जिक्र

बन गया खामोश अहसास

अब तो आदत सी हो गई है इस जिक्र की

क्योंकि ये हर वक्त साथ साथ चलता है

कभी ये मेरे दिल में उतरता है

और मुझसे बातें करता है

बात करने का मन हो न हो

यह बात करता है ,तेरे होने की