Wednesday, September 3, 2008

ब्लॉग पर लिखने से क्या होगा ?

आफिस से घर आकर जैसे ही टीवी खोला, वहां एक मासूम सी तीन दिन की जख्मी बच्ची को दिखाया जा रहा था जिसे उसके माता पिता ने उसे तीन दिन पूर्व नहर में फेंक दिया था। उसकी किसमत अच्छी थी कि वह बच गई लेकिन उसके पैरों एवं बॉडी के अन्य हिस्सों पर कीड़ों ने काट रखा था। वह बुरी तरह से रो रही थी, उसका करहाना ऐसा था कि दिल दर्द से भर उठा। नहर में फेंकने के पीछे वही कारण होगा जो अभी तक रहा है। कारण चाहे कुछ भी हो, लेकिन हम सब, हमारा समाज अभी समझ नहीं रहा है, जिस दिन उसे समझ आयेगी, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। यह घटना फरीदाबाद की है।अभी कुछ माह पहले भी हरियाणा में ही ठीक ऐसी ही घटना हुई थी, मैंने वो खबर रात को लगभग 11 बजे देखी थी। रात भर सो नहीं सकी, कुछ विचार मेरे मन में आये, जो मैंने अपने ब्लाग पर डाल दिये थे, लेकिन मेरा सवाल है यह है ब्लाग पर लिखने से क्या होगा ?
क्यों फैंका गया मुझे नहर में
औरत मर्द के देह सुख से उपजी हूं मैं
उस औरत मर्द के लिये मैं कुछ भी नहीं थी
इसी लिये उन्होंने मुझे फैंक दिया नहर में
फैंके जाने के बाद फंसी झािड़यों में
और आ गई किसी नजर में
फैंके जाने का दर्द है बहुत बड़ा दर्द
मेरे जिस्म पर भी और मन पर भी
लोग कह रहे हैं
अब मेरी दुनिया बदल रही है
हो सकता है सही कह रहे हों
कल पता नहीं क्या हो,यह दर्द कम हो जाये या जानलेवा हो जाए
मुझे नाम मिल गया है
करूणा
हरियाणा की करूणा
कोई गोद भी मिल जायेगी
फिर भी मैं सोचूंगी
आखिर मुझे क्यों फैंका गया नहर में
क्या मैं बेटी थी इस लिये
वो बेटी जो भाई के लंबी उमर के लिये दुआ करती है
वो बेटी घर आंगन का करती है ख्याल
अपनी आखिरी सांस तक
मनविंदर भिम्बर

Sunday, August 31, 2008

जन्मदिन मुबारक हो....... अमृता जी

अमृता जी! जन्म दिन मुबारक हो, आप जहां भी होंगी, तारों की छांव में, बादलों की छांव में ,सब कुछ देख रही होंगी, आपको मेरी और आपके सभी चाहने वालों की ओर से जन्म दिन मुबारक। आज मुझे वह दिन भी याद आ गया जब मैं अमृता से मिलने उनके निवास हौसखास गई थी। उस दिन वे बहुत बीमार थी या यूं कहिए कि वे बीमार ही चल रही थी उन दिनों, ज्यादा बोल नहीं पा रही थी लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे कुछ पल दिये, वो कुछ पल मेरे लिये सदैव अनमोल रहेंगे। यह मुलाकात मैं अकेले नहीं करना चाहती थी , लेकिन जब मिलने की घड़ी आयी तो मैं अकेले ही गई। मैंने इमरोज और अमृता दोनों से बातें की, यूं समझ लें कि उन पलों में हर बात जानने के लिये जल्दबाजी महसूस हो रही थी। उनके लेखन के बारे में , उनके और इमरोज के साथ साथ जीवन गुजारने के बारे में , उनके परिवार के बारे में, दुनिया की सोच के बारे में। सभी बातें हुई भी। उन्होंने औरत, प्यार, संबध और समाज सभी पर खुल कर कहा, उनके इस कहने में इमरोज ने काफी मदद की क्योंकि वे बोल नहीं पा रही थी। वैसे भी अमृता का जिक्र हो, इमरोज का न हो, ये कैसे हो सकता है? वो सब मैंने सखी के अप्रैल २००३ के अंक में एक आर्टीकल "अपनी बात" में समेटा। सखी जागरण ग्रुप की महिला मैगजीन है। उस समय मैं जागरण ग्रुप के साथ ही जुड़ी थी। इसे आप भी पढ़ सकते हैं। सालों बाद ,अभी पिछले सप्ताह फिर मेरी मुलाकात इमरोज से हुई, बहुत सी बातें हुई उनसे। मेरा फोकस था कि वे अमृता के बगैर कैसे समय बिता रहे हैं, उन्होंने मेरे इस जुमले पर एतराज किया, कहा, अमृता को पास्ट टेंस में मत कहो, वो मेरे साथ ही है, उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं। मैं कहीं भीतर तक उनकी इस बात से अभिभूत हो गई। फिर मन में ख्याल आया, अरे मैं तो आज भी अकेली ही आयी हूं। बेइंतहा मोहब्बत की कहानी को जान कर उनके सच्चे किरदारों को मिल कर ´कुछ` याद आ जाना लाजमी है। आज कहां है ऐसे प्यार करने वाले???? बहुत बातें हुई, बहुत देर बातें हुई, वो मैं अगली पोस्ट में लिखूंगी।

Tuesday, August 26, 2008

झारखंड का गरीब राजू

2007 की वह 7 फरवरी की सुबह थी, जब पहली बार मेरे घर आया, मैने पहली बार देखा तो वह काफी कमजोर और डरा हुआ लग रहा था। मैंने उससे उसका नाम नाम पूछा , उसने बताया, राजू। मैंने उसे देखते ही अपने पति से कहा, इससे मैं घर का काम नहीं करायूंगी। बोले, क्यों, मैंने कहा, यह तो बहुत छोटा है। मेरी बातें राजू ने सुनी तो बोला, आंटी, मुझे वापस मत भेजना, मेरी मां को पैसे की जरूरत है। घर में पैसे की तंगी है। मैं छोटा नहीं हूं, मैं पहले भी काम कर चुका हूं, मैंने पूछा कहां, बोला, गांव में पत्थर तोड़ने का काम किया है मैंने। अपने हाथ दिखा कर बोला, ये देखो, मेरे हाथ पत्थर तोड़ कर कैसे पत्थर हो गये हैं। मासूम के हाथ सचमुच पत्थर के से थे, उसकी मासूमियत से मैं ये भी भूल गई कि ये बच्चा मेरे पास घर का काम करने आया है। मैंने उसे प्यार से कहा, नहीं अब तुम यही रहोगे, मेरे पास। बस वो मेरे पास रहने लगा, उसकी उम्र यही होगी, कोई चोदह साल की लेकिन लगता बहुत छोटा था। झारखंड से आया था। दिन महीने गुजरे, राजू कुछ ही दिनों में कद निकालने लगा। छह महीने में उसका सांवला सा चेहरा भरने लगा और और उसमें महानगर की हवा दिखने लगी। हम आफिस निकल जाते, वह घर में ,बीजी मेरी सासु जी के पास रहता। उसकी उम्र को देखते हुए मैंने घर में पार्टटाइम नौकरानी रख ली लेकिन फिर भी वह मेरा काफी काम देता था। मैं उसे घर पैसे भी भिजवाती रही। जब बेटे आते तो वह बहुत खुष दिखयी देता। उनके कपड़े देख कर वैसे ही कपड़ों की मांग करता, मैं भी ला कर देती। एक दिन राजू बोला, आंटी, जब मैं घर जायूंगा तो मुझे बहुत सारे नोट देना, मैं अपनी मां की झोली डाल दूंगा। मैंने उसे समझाया कि रेल में छोटे नोट संभालने में दुविधा होगी, मैं जाते समय बड़े नोट ही दूंगी। अप्रैल में उसके गांव में मेला भरता है नवरात्रा के महीने में। मैं उसकी तैयारी कर रही थी, राजू बोला, आंटी आप तो ऐसे तैयारी कर रही हो जैसे मैं कभी आयूंगा ही नहीं, मैंने कहा, नहीं गांव में मेला देख कर तुम लौट आना। मैंने उसके हिसाब के पैसे उसके अंदर के कपड़ों में थैली में सिल दिये और कहा , मां के सामने ही जा कर अंदर वाले पैसे निकालना, टिकट दिलवायी और रेल में बिठा दिया, रेल में बैठ कर राजू बोला, मैं जाते ही फेान कर दूंगा। मुझे उसके अकेले जाना ठीक नहीं लग रहा था लेकिन उसकी मां ने रिक्वेस्ट की तो मैंने उसे भेज दिया। और राजू पहुंच गया अपने गांव, अपनी मां के पास, इस बीच उसके कई बार फेान आते रहे। जुलाई के किसी दिन वह फोन पर बोला, आंटी में कल बैठ रहा हूं आने के लिये, मैंने बोला, अभी मत आना , भईया दिल्ली में नहीं है मुंबई गया है, वह तुम्हें दिल्ली से रिसीव नहीं कर सकेगा, फिर दो दिन के बाद ही उसकी मां का फोन आया कि राजू की तबीयत ठीक नहीं है, मैंने ज्यादा गौर नहीं किया और दिन गुजरने लगे। आज अचानक उस बंदे का फोन आया जो राजू के गांव का ही तथा वही राजू को ले कर आया था, उसने बताया, राजू नहीं रहा, मेरे लिये यह चौकने की खबर थी, उसने बताया कि राजू की किडनी फेल हो गई थी, मां के पास इलाज के लिये पैसे भी नहीं थे, उसके गांव में कोई खास दवादारू भी नहीं हो सकी क्योंकि वहां अस्पताल भी नहीं है। रांची ले कर जाने के लिये घर में पैसे नहीं थे, बस चला गया गरीब राजू दुनिया छोड़। मेरा मन तभी से ठीक नहीं हो रहा हैं। बैचेनी महसूस हुई तो लिखने बैठ गई। दिमाग में आ रहा है कि गरीब क्या ऐसे ही चला जायेगा दुनिया से बिना दवा के, बिना इलाज के, हर दिन टीवी पर देखती हूं, गरीबों के लिये तैयार होने वाली योजनाओं के विज्ञापन, उनके लिये चिकित्सा की चिंताएं लेकिन राजू को तो इलाज नसीब नहीं हुआ। ऐसे न जाने कितने राजू हैं जो हर दिन मां को रोता बिलखता छोड़ जा कर रहे हैं हिंदुस्तान के देहातों से, लेकिन कौन सवाल उठाता है इस व्यवस्था पर।

Wednesday, August 13, 2008

महिला काजी ने पढ़ाया निकाह!

एक खबर बताना चाहती हूं, लखनउ में एक महिला ने निकाह पढ़ाया है। खास यह है कि ये निकाह भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन की अध्यक्ष नाइस हसन और इमरान का था। इस निकाह में कई बातें नये तौर तरीकों से हुई। जैसे निकाह पढ़ाने वाली महिला डा साईदा हमीद जो प्लानिंग कमीषन की सदस्य हैं। इसके अलावा निकाह कराते समय अंग्रेजी के वर्ड्स का अधिक प्रयोग हुआ। डा साईदा हमीद कहती है कि निकाह दो लोगों के बीच होने वाला एक एग्रीमेंट है जिनमें किसी मौलवी का होना जरूरी नहीं है। इसे मौलवी लोग खुले दिल से स्वीकर लेंगे, वक्त बतायेंगा लेकिन ,मजेदार यह है कि निकाह में मुसलिम महिला परसनल ला बोर्ड की अध्यक्ष साहिस्ता अंबर भी मौजूद रहीं। अब इस पर हंगामा न मचे कि महिलाएं काजी नहीं हो सकती है। वैसे जब समाज के ठेकेदारों की बात होती है वहां हल्ला गुल्ला मचना लाजमी है।

Sunday, August 10, 2008

आंसू अगर बिकते कहीं..........

आज सुबह ही खबर मिली , विश्णु खन्ना नही रहे, गीतकार और पत्राकार विश्णु खन्ना। एक बार तो यकीन नहीं हुआ लेकिन फिर उसी क्षण एक सप्ताह पहले की फोन की बात याद आगई, और साथ ही याद आ गई उनके कुछ पक्तियां, फिर नई सुबह होगी फिर नया गीत होगा इस गीत को अब जाने दो इसे मत रोको मैंने वो डायरी खोली यहां एक पक्तियां मैंने लिख छोड़ी थी। उस दिन का मंजर भी सामने आ गया जब उन्हें उत्तर प्रदेष हिंदी संस्थान की ओर से महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्राकारिता पुरस्कार मिलने पर एक समारोह मनाया था। उस दिन वे मंच से जी खोल कर बोले। कतिवा, गीत और आकाषवाणी की बाते हुई। फिर एक बार,उस दिन जब मैंने जब उनसे फोन पर उनके घर आने के लिये अनुमति मांगी तो वे मुझे गेट पर ही मिल गये। खूब बातें हुए थी उन दिन भी। कुछ बातें तो लिख कर भी की गई। महापौर के चुनाव के सिलसिले में मैं उनसे मिलने गई थी। उन्होने अपने परम मित्रा अभय गुप्त और भारत भूशण के लिये भी काफी भावुक बातें की और बताया कि अब इस कालोनी में आ कर उनसे दूर हो गया हूं और सेहत भी कहीं जाने की अनुमति नहीं देती है। चालीस साल आकाषवाणी को देने के बावजूद वे अपने उस दौर को कभी नहीं भूले। मुझे अपने आकाषवाणी के दौर की कई फोटो दिखाए। मैंने पहली बार यह महसूस किया कि यह इंसान कितना अकेला है। उनका एक बेटा है, एक बेटी है। बहूं बहुत ख्याल करती है लेकिन सब की अपनी अपनी दुनियां है, सभी व्यस्त हैं। यह व्यक्ति अगर चाहता तो आज न जाने कहां होता, कई ऐसे मौके आये जो उन्हें आसामन की बुलंदियों पर भी पहुंचा सकते थे लेकिन उन्होंने कभी अपने जमीर को अनदेखा नहीं किया। मुझसे बोले आंसू अगर बिकते कहीं होता बहुत धनवान मैं मुझे सुविधाओं की कभी कमी नहीं रहीं लेकिन मैंने अपने दिल की सुनी है। आज गीत बिकता है। गीतकार बिकता है। क्या करूं , मैं ऐसा नहीं हो सकता हूं। अगली पोस्ट में जारी रहेगा

Sunday, July 13, 2008

बोल्ड लेखन की मलालत

अभी चार दिन पहले ही रचना ने एक कविता पोस्ट की थी ´नारी का कविता ब्लाग` पर, ´इस लिये मुझे फक्र है कि मैं दूसरी औरत हूं` कविता ने बहुत अच्छी बहस छेड़ दी। अब तक इस पर तीस से अधिक कमेंट आये जो अपने आप में एक रिकार्ड है। कमेंट ने यह भी साफ किया कि समाज की सोच में परिवर्तन तो है लेकिन हम सच से मुंह फेर लेते हैं। खैर , सबजेक्ट ऐसा रहा जिसे पढ़ कर सभी ने इस पर बहुत कुछ सोचाकिसी ने इसे समाज को तोड़ने की बात से जोड़ा तो किसी ने इसे जमाने की बदलती तस्वीर कहा। कुछ कमेंट पर मुझे अफसोस भी हुआ, जिसमें देह को सोंपने के सवाल पर भी तंज कसे गये। रचना की बोल्डनेस पर मुझे इस्मत चुगतायी की याद आ गई। उसे लिहाफ के लिये काफी मलालत झेलनी पड़ी थी, बाद में तो उसे लाहौर कोर्ट में भी प्रस्तुत होना पड़ा। यहां में जिक्र कर दूं कि इस्मत आपा को बोल्ड लेखन की मलालत क्यो झेलनी पड़ी। उन्होंने ´लिहाफ` की किरदार जान बेगम के बारे में वह सब कुछ सच सच लिख दिया जिसे उस दौर में लिखना तो क्या, आपस में चर्चा करना भी जुर्म था। जान बेगम जवान थी, खूबसूरत देह की मालकिन लेकिन उनके पति उनकी जवानी को देखते ही नहीं थे। फिर वे अपनी नौकरानी रब्बो के साथ मस्त हो गई। जान बेगम और रब्बो के बीच जो रिष्ता बना, उसे इस्मत आपा ने अपनी कहानी ´लिहाफ` में लिखा। दो औरतों के बीच रिष्ते की बात आज भी समाज को हजम नहीं होती है तो उसे दौर में तो कोई सवाल नहीं पैदा होता है। इस कहानी पर बहुत रोला मचा लेकिन इस्मत को तो कुछ अलग करने का जुनून था। वे लाहौर कोर्ट में प्रस्तुत हुई, उनका साथ उस समय केवल मोंटो ने दिया। रोले रप्पे की बात आई गई हो गई लेकिन उस कहानी की किरदार जान बेगम का निकाह दूसरी जगह हो गया और जब इस्मत को वह एक पार्टी में मिली तो उनकी गोद में एक बच्चा भी था। वह पहले भी पूर्ण और खूबसूरत दिखायी दी तो इरस्मत को लगा कि उनकी कहानी को सार्थकता मिल गई। इसी के साथ एक और लेखिका का जिक्र भी मैं करना चाहूंगी, वह है krishna sobhati । इन्हें भी अपने लिखे पर काफी कुछ सुनने को मिला जब इन्होंने ´मित्राो मरजानी` को लिखा। मित्राो यानि सुमित्राारानी , एक सभ्य परिवार की बहू ,जिसे बहू बने रहने के तौर तरीके पसंद नहीं हैं। उसका खुलापन ससुराल में किसी को एक आंख नहीं भाता है। इसी लिये वह घर परिवार में तो विवादास्पद बनी बाद में उसे हिंदी कथा जगत में भी काफी जलालत का सामना करना पड़ता है। मित्राों का चरित्र उस समय भले ही कितने भी विवादों में रहा हो लेकिन सोचने की बात यह है उसमें ममता, मां बनने की चाहत और वासना-सरिता अगर बहती है तो उसमें सोबती का क्या कसूर है। रचना , अब समय बदला है लेकिन विद्रोही कलम ने तो सालों पहले सोच से परते उठानी प्रारंभ कर दी थी। तुम्हारी कलम नारी के सभी पुराने बिंबो को खिलाफ नया आकशZण है। ये तुम्हारी कविता की तारीफ नहीं है, न ही कोई कमेंट, यह तुम्हारी लेखनी की बोल्डनेस है जिसे मैंने चैट के दौरान तुमसे सांझा किया था। तुमने समाज की ऐसी दुखती रग पर प्रहार कर दिया है ,दूसरी औरत के फक्र को जाहिर कर जिसे कोई सहन नहीं पाया आसनी से।

Saturday, July 12, 2008

पापा के पचास दिन

पचास दिन के बाद डा तलवार रिहा हो गये। आरूिश के पिता डा तलवार। एक खबर, लेकिन इस खबर के पीछे का सच कोई जान नहीं पायेगा। अब कोई कहेगा कि यू पी पुलिस को जवाब देना चाहिए। कोई कहेगा कि सीबीआई ने बहुत अच्छा किया है। इस पूरे प्रकरण में मुख्य बात है वो दर्द जो डा नुुपुर ने बेटी को खो देने के बाद अकेले झेला क्योंकि डाक्टर तलवार भी जेल में थे, उधर डाक्टर तलवार ने भी इस दुख को अकेला झेला क्योंकि बेटी को तो खो दिया, साथ ही बेटी की हत्या का आरोप भी झेला। तलवार दंपत्ति की इकलौती संतान थी आरूिश। ‘ााष्विवाह के चौदह साल के बाद आरूिश का जन्म कई इलाजों , मन्नतों और दुआयों के बाद हुआ था। आरूिश टेस्ट ट्यूब बेबी थी, मात्रा चादह साल की, जिसने दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था। उस पर क्या क्या नही दिखाया गया मीडिया में। इसमें मीडिया का रोल भी संवेदनाअों से परे चला गया। कभी आरूिश के बलात्कार की नई खोज की खबर तो कभी डाक्टर तलवार के डाक्टर दुरानी के साथ नाजायज संबंधों की खबर। आखिर होड़ यह थी कि कौन कितनी पहले खबर प्रसारित करता है। किसी ने यह नहीं सोचा कि सामान्य बाप अपनी बेटी को क्यों मारेगा? वह बेटी जो चौदह सालों के बाद उन्हें नसीब हुई। किसी को यह समझ नहीं आया कि आरूिश कोई बड़ी गलती भी करती तो भी डाक्टर तलवार उसे मारना तो क्या, डांटते भी नहीं। जब से डाक्टर तलवार को सीबीआई ने आरोपों से बरी कर दिया , उसी पल से सारी खबरों में डाक्टर तलवार के प्रति अपनापन दिखने लगा। सवाल यह है कि वो पचास दिन तलवार दंपत्ति के जीवन में कैसे वापस आयेंगे जो उन्होंने मानसिक यातना में गुजरो है। कभी मान को ठेस तो कभी मन को ठेस।