Wednesday, August 13, 2008
महिला काजी ने पढ़ाया निकाह!
एक खबर बताना चाहती हूं, लखनउ में एक महिला ने निकाह पढ़ाया है। खास यह है कि ये निकाह भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन की अध्यक्ष नाइस हसन और इमरान का था। इस निकाह में कई बातें नये तौर तरीकों से हुई। जैसे निकाह पढ़ाने वाली महिला डा साईदा हमीद जो प्लानिंग कमीषन की सदस्य हैं। इसके अलावा निकाह कराते समय अंग्रेजी के वर्ड्स का अधिक प्रयोग हुआ। डा साईदा हमीद कहती है कि निकाह दो लोगों के बीच होने वाला एक एग्रीमेंट है जिनमें किसी मौलवी का होना जरूरी नहीं है। इसे मौलवी लोग खुले दिल से स्वीकर लेंगे, वक्त बतायेंगा लेकिन ,मजेदार यह है कि निकाह में मुसलिम महिला परसनल ला बोर्ड की अध्यक्ष साहिस्ता अंबर भी मौजूद रहीं। अब इस पर हंगामा न मचे कि महिलाएं काजी नहीं हो सकती है। वैसे जब समाज के ठेकेदारों की बात होती है वहां हल्ला गुल्ला मचना लाजमी है।
Sunday, August 10, 2008
आंसू अगर बिकते कहीं..........
आज सुबह ही खबर मिली , विश्णु खन्ना नही रहे, गीतकार और पत्राकार विश्णु खन्ना। एक बार तो यकीन नहीं हुआ लेकिन फिर उसी क्षण एक सप्ताह पहले की फोन की बात याद आगई, और साथ ही याद आ गई उनके कुछ पक्तियां,
फिर नई सुबह होगी
फिर नया गीत होगा
इस गीत को अब जाने दो
इसे मत रोको
मैंने वो डायरी खोली यहां एक पक्तियां मैंने लिख छोड़ी थी। उस दिन का मंजर भी सामने आ गया जब उन्हें उत्तर प्रदेष हिंदी संस्थान की ओर से महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्राकारिता पुरस्कार मिलने पर एक समारोह मनाया था। उस दिन वे मंच से जी खोल कर बोले। कतिवा, गीत और आकाषवाणी की बाते हुई। फिर एक बार,उस दिन जब मैंने जब उनसे फोन पर उनके घर आने के लिये अनुमति मांगी तो वे मुझे गेट पर ही मिल गये। खूब बातें हुए थी उन दिन भी। कुछ बातें तो लिख कर भी की गई। महापौर के चुनाव के सिलसिले में मैं उनसे मिलने गई थी। उन्होने अपने परम मित्रा अभय गुप्त और भारत भूशण के लिये भी काफी भावुक बातें की और बताया कि अब इस कालोनी में आ कर उनसे दूर हो गया हूं और सेहत भी कहीं जाने की अनुमति नहीं देती है। चालीस साल आकाषवाणी को देने के बावजूद वे अपने उस दौर को कभी नहीं भूले। मुझे अपने आकाषवाणी के दौर की कई फोटो दिखाए। मैंने पहली बार यह महसूस किया कि यह इंसान कितना अकेला है। उनका एक बेटा है, एक बेटी है। बहूं बहुत ख्याल करती है लेकिन सब की अपनी अपनी दुनियां है, सभी व्यस्त हैं। यह व्यक्ति अगर चाहता तो आज न जाने कहां होता, कई ऐसे मौके आये जो उन्हें आसामन की बुलंदियों पर भी पहुंचा सकते थे लेकिन उन्होंने कभी अपने जमीर को अनदेखा नहीं किया। मुझसे बोले
आंसू अगर बिकते कहीं
होता बहुत धनवान मैं
मुझे सुविधाओं की कभी कमी नहीं रहीं लेकिन मैंने अपने दिल की सुनी है। आज गीत बिकता है। गीतकार बिकता है। क्या करूं , मैं ऐसा नहीं हो सकता हूं।
अगली पोस्ट में जारी रहेगा
Sunday, July 13, 2008
बोल्ड लेखन की मलालत
अभी चार दिन पहले ही रचना ने एक कविता पोस्ट की थी ´नारी का कविता ब्लाग` पर, ´इस लिये मुझे फक्र है कि मैं दूसरी औरत हूं` कविता ने बहुत अच्छी बहस छेड़ दी। अब तक इस पर तीस से अधिक कमेंट आये जो अपने आप में एक रिकार्ड है। कमेंट ने यह भी साफ किया कि समाज की सोच में परिवर्तन तो है लेकिन हम सच से मुंह फेर लेते हैं। खैर , सबजेक्ट ऐसा रहा जिसे पढ़ कर सभी ने इस पर बहुत कुछ सोचाकिसी ने इसे समाज को तोड़ने की बात से जोड़ा तो किसी ने इसे जमाने की बदलती तस्वीर कहा। कुछ कमेंट पर मुझे अफसोस भी हुआ, जिसमें देह को सोंपने के सवाल पर भी तंज कसे गये।
रचना की बोल्डनेस पर मुझे इस्मत चुगतायी की याद आ गई। उसे लिहाफ के लिये काफी मलालत झेलनी पड़ी थी, बाद में तो उसे लाहौर कोर्ट में भी प्रस्तुत होना पड़ा। यहां में जिक्र कर दूं कि इस्मत आपा को बोल्ड लेखन की मलालत क्यो झेलनी पड़ी। उन्होंने ´लिहाफ` की किरदार जान बेगम के बारे में वह सब कुछ सच सच लिख दिया जिसे उस दौर में लिखना तो क्या, आपस में चर्चा करना भी जुर्म था। जान बेगम जवान थी, खूबसूरत देह की मालकिन लेकिन उनके पति उनकी जवानी को देखते ही नहीं थे। फिर वे अपनी नौकरानी रब्बो के साथ मस्त हो गई। जान बेगम और रब्बो के बीच जो रिष्ता बना, उसे इस्मत आपा ने अपनी कहानी ´लिहाफ` में लिखा। दो औरतों के बीच रिष्ते की बात आज भी समाज को हजम नहीं होती है तो उसे दौर में तो कोई सवाल नहीं पैदा होता है। इस कहानी पर बहुत रोला मचा लेकिन इस्मत को तो कुछ अलग करने का जुनून था। वे लाहौर कोर्ट में प्रस्तुत हुई, उनका साथ उस समय केवल मोंटो ने दिया। रोले रप्पे की बात आई गई हो गई लेकिन उस कहानी की किरदार जान बेगम का निकाह दूसरी जगह हो गया और जब इस्मत को वह एक पार्टी में मिली तो उनकी गोद में एक बच्चा भी था। वह पहले भी पूर्ण और खूबसूरत दिखायी दी तो इरस्मत को लगा कि उनकी कहानी को सार्थकता मिल गई।
इसी के साथ एक और लेखिका का जिक्र भी मैं करना चाहूंगी, वह है krishna sobhati । इन्हें भी अपने लिखे पर काफी कुछ सुनने को मिला जब इन्होंने ´मित्राो मरजानी` को लिखा। मित्राो यानि सुमित्राारानी , एक सभ्य परिवार की बहू ,जिसे बहू बने रहने के तौर तरीके पसंद नहीं हैं। उसका खुलापन ससुराल में किसी को एक आंख नहीं भाता है। इसी लिये वह घर परिवार में तो विवादास्पद बनी बाद में उसे हिंदी कथा जगत में भी काफी जलालत का सामना करना पड़ता है। मित्राों का चरित्र उस समय भले ही कितने भी विवादों में रहा हो लेकिन सोचने की बात यह है उसमें ममता, मां बनने की चाहत और वासना-सरिता अगर बहती है तो उसमें सोबती का क्या कसूर है।
रचना , अब समय बदला है लेकिन विद्रोही कलम ने तो सालों पहले सोच से परते उठानी प्रारंभ कर दी थी। तुम्हारी कलम नारी के सभी पुराने बिंबो को खिलाफ नया आकशZण है। ये तुम्हारी कविता की तारीफ नहीं है, न ही कोई कमेंट, यह तुम्हारी लेखनी की बोल्डनेस है जिसे मैंने चैट के दौरान तुमसे सांझा किया था। तुमने समाज की ऐसी दुखती रग पर प्रहार कर दिया है ,दूसरी औरत के फक्र को जाहिर कर जिसे कोई सहन नहीं पाया आसनी से।
Saturday, July 12, 2008
पापा के पचास दिन
पचास दिन के बाद डा तलवार रिहा हो गये। आरूिश के पिता डा तलवार। एक खबर, लेकिन इस खबर के पीछे का सच कोई जान नहीं पायेगा। अब कोई कहेगा कि यू पी पुलिस को जवाब देना चाहिए। कोई कहेगा कि सीबीआई ने बहुत अच्छा किया है। इस पूरे प्रकरण में मुख्य बात है वो दर्द जो डा नुुपुर ने बेटी को खो देने के बाद अकेले झेला क्योंकि डाक्टर तलवार भी जेल में थे, उधर डाक्टर तलवार ने भी इस दुख को अकेला झेला क्योंकि बेटी को तो खो दिया, साथ ही बेटी की हत्या का आरोप भी झेला। तलवार दंपत्ति की इकलौती संतान थी आरूिश। ‘ााष्विवाह के चौदह साल के बाद आरूिश का जन्म कई इलाजों , मन्नतों और दुआयों के बाद हुआ था। आरूिश टेस्ट ट्यूब बेबी थी, मात्रा चादह साल की, जिसने दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था। उस पर क्या क्या नही दिखाया गया मीडिया में। इसमें मीडिया का रोल भी संवेदनाअों से परे चला गया। कभी आरूिश के बलात्कार की नई खोज की खबर तो कभी डाक्टर तलवार के डाक्टर दुरानी के साथ नाजायज संबंधों की खबर। आखिर होड़ यह थी कि कौन कितनी पहले खबर प्रसारित करता है। किसी ने यह नहीं सोचा कि सामान्य बाप अपनी बेटी को क्यों मारेगा? वह बेटी जो चौदह सालों के बाद उन्हें नसीब हुई। किसी को यह समझ नहीं आया कि आरूिश कोई बड़ी गलती भी करती तो भी डाक्टर तलवार उसे मारना तो क्या, डांटते भी नहीं। जब से डाक्टर तलवार को सीबीआई ने आरोपों से बरी कर दिया , उसी पल से सारी खबरों में डाक्टर तलवार के प्रति अपनापन दिखने लगा। सवाल यह है कि वो पचास दिन तलवार दंपत्ति के जीवन में कैसे वापस आयेंगे जो उन्होंने मानसिक यातना में गुजरो है। कभी मान को ठेस तो कभी मन को ठेस।
Sunday, June 15, 2008
कैसा है मौसम
आज सुबह अभी बिस्तर भी नहीं छोड़ा था कि मैसेज आ गया, हैप्पी रेनी डे। गैलरी में उठ कर देखा तो सचमुच बरसात हो रही थी। मेरे देखते देखते बरसात तेज हो गई। सच ऐसे मौसम को देख कर लगा कि बच्चे ऐसे ही नैनीताल गये हैं। यहां भी नैनीताल सा ही मौसम है। अखबार उठाया तो उसमें भी मौसम वैज्ञानिकों की बातें पढ़ने को मिली। एक अखबार में तो किसानों और उनकी फसलों के बारे में भी लिखा हुआ था। फिल्मों में मुंबई की बरसात को रोमांस से जोड़ा जाता है लेकिन सुबह सुबह का मौसम देख कर मुंबई भी का भी दिल छोटा हो रहा होगा। रेडियों आन किया तो रेडियो जॉकी भी मौसम से सराबोर मिली, लगा कि राजधानी में भी मौसम खूबसूरत है। फिर गीतों का दौर चल निकला, भीगी भीगी रातों में भीगी बरसातों में कैसा लगता है-----सच कितना रोमांस है इस गीत में। एक और गीत याद आता है, प्यार हुआ इकरार हुआ, प्यार से फिर दिल डरता है क्यों---------राज कपूर और नरगिस की जोड़ी अनायास ही आंखों में तैर जाती है। हिंदी फिल्मों में बरसात के एक से एक रोमांटिक गीत दिये हैं। बरसात की फुहारों में झूमने को प्रेेमियों को बहाने दिये हैं। वैसे देखा जाए तो फिल्मों की बात छोड़ दें तो काई विरला ही सुखी होता होगा बसरात में भीग कर। अधिकतर तो भीगने पर काफी दुखी होते हैं। मौसम चाहे गमीZ का हो या सदीZ का। कई बार बरसात में माल रोड से गुजरते हुए देखा गया है कि प्रेमिका प्रेमी की बाइक के पीछे बैठी प्रेमी की पीठ में धंसी जा रही है, प्रेमिका लगता है कि ऐसे बचा जा सकता है वरसात से। हां! माल रोड के कंपनी गार्डन में बरसात के मौसम में प्रेमी जोड़े जरूर मौसमा का लुत्फ लेते हैं। प्रमियों को नहीं पता कि बरसात का पानी कुछ घरों की छतों से होता हुआ जब घर के सामान पर गिर कर उसे खराब कर देता है तो उस घर के लोगों को कैसा लगता है। जब वाटर लॉगिंग से गुजरना पड़ता है तो कैसा लगता है। एक बात और, बरसात से जब आबू का नाला उपर तक भर जाता है तो उस पर तैर रही प्लािस्टक की बोतलों जमा कर उन्हें बेचना बच्चों बहुत भाता है क्योंकि बोतले बेच कर कुछ अपनी मां को रात की रोटी का जूगाड़ करने में मदद करते है तो कुछ भुटृटे का मजा लेते हैं। खैर, बरसात में बरसात के गाने सुन कर उनका मजा लेना ही ठीक है, क्या सोचना और बातों को। रेडियो जॉकी का मस्त अंदाज सुनिये।
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Sunday, April 20, 2008
कहानी गुड़िया की
एक था आरिफ एक थी गुिड़या, गुिड़या मर गई लेकिन फिर खत्म नहीं हुई कहानी।कहानी आज भी चल रही है। पूछो क्यों?आरिफ अचानक जब कारगिल की लड़ायी के दौरान मस्कोह सैक्टर से लापता हो गया तो भारतीय सेना ने पहले उसके लापता होने की बात कही और फिर उसे भगोड़ा करार दे दिया। लापता होने के लगभग पांच सालों के बाद सेना ने जानकारी दी कि आरिफ पाकिस्तान की जेल में हैं। इसके बाद आरिफ को पाकिस्तान जेल से रिहा कर दिया गया। लेकिन आने पर उसे पता चला कि उसकी दुनिया उजड़ चुकी है, जिस गुिड़या को वह छोड़ कर गया था, उसने तौफीक से विवाह कर लिया है। इधर, गुिड़या भी कम उहापोह में नहीं थी। जिस दिन आरिफ अपने घर मुंडाली पहुंचा, गुिड़या पेट से थी। मैंने जब गुिड़यों को उसके ससुराल में देखा तो उसके चेहरे पर गम की लकीरे साफ चमक रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किसकी पत्नी है, आरिफ की या तौफीक की? तौफीक का बच्चा पेट में ले कर उसे आरिफ के घर में रहना बेहद दुष्वार लग रहा था। यह बात उसने मेरे कानों बुदबुदा कर कही भी। मीडिया ने भी गुिड़या और आरिफ काफी परेषान किया। आखिर गुिड़या क्या कहे ? और क्या कहे आरिफ ? तौफीक की सुनने का तो सवाल ही पैदा नहीं हो रहा था। पंचायतों, उलेमाओं और मीडिया को सहते सहते गुिड़या ने समय से पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया और बीमार रहने लगी। आखिर दो जनवरी 2006 को गुिड़या ने उस दुनिया को छोड़ दिया जिसने उस पर अपने सारे नियम थोपे और उसे अपनी मजीZ से जीने भी नहीं दिया। आरिफ की कहानी गुिड़यां के मरने से खत्म नहीं हुई। उसने गुिड़या के मरने के दस दिन बाद ही उसके बेटे मतीन को तौफीक के हवाले कर दिया और खुद छढ़ौली की साइस्ता से निकाह कर लिया। आरिफ की जिंदगी में अभी दुष्वारियां बाकी थीं। मुसीबतें आरिफ का एक एक कर इम्तेहान ले रही थीं। उसकी दूसरी बीवी ने एक बेटी अनम को जन्म दिया और उसी दिन के बाद से वह बीमार रहने लगी। उसे ब्लड कैंसर था लेकिन यह बात उसने छिपा कर रखी और 19 अप्रैल को दिल्ली के सैनिक अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मुझे आज भी याद आता है गुिड़या की वह खूबसूरत आंखें जिनमें दिल के अरमान तैर तो रहे थे लेकिन लेकिन बहुत खामोषी से । वह आरिफ के घर में थी और उसके दिल में तौफीक था, पेट में तौफीक के प्रेम की निषानी, बहुत दुष्वार लग रहा था गुिड़या को यह सहना।गुिड़यां मरी लेकिन आरिफ और गुिड़या की कहानी खत्म नहीं हुई। तौफिक और गुिड़या का बेटा मतीन तौफीक को मिल गया लेकिन दुनिया भर की जलालत के बाद। अब साइस्ता और आरिफ की बेटी , पता नहीं उसका क्या होगा ? इंसान का किया धरा सब सामने आता है लेकिन फिर भी समाज, उलेमा और कायदेण्ण्ण्ण्ण् दिल क्यों दुखाते हैं?
Friday, April 18, 2008
सेरोगेट नानी
रिश्तों में भरोसा करना आज सबसे बड़ी समस्या है। मुझे जान कर हैरानी हुई कि सेरोगेसी भी इससे जुदा नहीं है। गुजरात को छोड़ दें तो बाकी के अधिकांष ए आर टी सेंटरों के रिकार्ड काफी चौकाने वाले हैं।गुजरात में तो हजारों की संख्या में सेरोगेट मदर जरूरतमंदों को मिल रही हैं लेकिन जब तक सेरोगेट मदर बच्चे को जन्म दे कर उसे माता पिता के हवाले नहीं कर देती है, माता पिता की जान सूखी रहती है। कई बार तो लाखों रूपये खर्च करने के बाद भी ऐन मौके पर सेरोगेट गर्भ में पल रहे बच्चे के प्रति अपना मोह त्याग नहीं पाती है। भारतीय सिनेमा ने तो ऐसी भावनाओं को खासा कैष कराया है। सच तो यह है कि सेरोगेसी बहुत बड़ा त्याग है। औरत से सभी उम्मीद भी यही करते हैं कि वह समाज के लियेए, परिवार के लिये त्याग करती रहे। बाजारवाद के चलते कुछ लोगों ने इसमें काफी जलालत भी सही है। पूना में तो अब सेरोगेसी के लिये नजदीकी रिष्ते खोजे जाते हैं। हैरान न हो, बेटी और दामाद का अंष नानी के गर्भ में भी पल सकता है। पूना में अधिकांष संतानहीन दंपत्ति अंडे एवं षुक्राणु इक्सी के मदद से अपनी किसी नजदीकी महिला के गर्भ रोपवाना पसंद करते हैं। मुझे इस बात पर यकीन नहीं हुआ तो ए आर टी सेंटर ,मधु जिंदल अस्पताल के डाण् सुनील एवं डाण्अंषु जिंदल ने भी चौकाने वाली जानकारी दी। उनके सेंटर पर कुछ ही महीने पहले एक नानी ने अपने देवते को जन्म दिया। इसे पूरी तरह से गोपनीय रखा गया। दरअसल नानी , भाभाी और बहन से नजदीकी रिष्ता और क्या होगा! इस रिष्ते में कभी एहसान नहीं जताया जायेगा। कभी बच्चे पर हक नहीं जमाया जायेगा। सबसे बड़ी बात है कि ये रिष्ते सेरोगेसी के लिये मोटी रकम भी नहीं मांगेंगे। एक पल के लिये देखा जाये तो सेरोगेसी के लिये बहुत बड़ा जिगरा चाहिए।कुछ तो ऐसे भी मामले प्रकाष में आये हैं कि जहां ए आर टी सेंटर की मदद भी नहीं ली गई, संतान सुख के लिये संबंध भी बनाये गये, भले ही यह भी कापफी जोखिम भरा काम है।
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